Sunday, July 29, 2012

काठमाण्डू आगमन और पशुपतिनाथ दर्शन

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मैं रक्सौल स्टेशन पर था और थोडी देर में सीमा पार करके नेपाल में प्रविष्ट हो जाऊंगा। रक्सौल का नेपाली भाई बीरगंज है। यानी सीमा के इस तरफ रक्सौल और उस तरफ बीरगंज। स्टेशन से करीब एक किलोमीटर दूर सीमा है। इस बात की जानकारी मुझे गूगल मैप से मिल गई थी। मैं अपने मोबाइल के उसी नक्शे के अनुसार रक्सौल स्टेशन से सीमा की तरफ बढ चला।
स्टेशन पर कई तांगे वाले खडे थे, जो मुझे देखते ही पहचान गये कि यह नेपाल जायेगा। मैंने उन सभी को नजरअन्दाज किया और आगे बढ गया। तभी पीछे से एक तांगे वाला आया और खूब खुशामद करने लगा कि मैं तुम्हे सीमा पार करा दूंगा। पैसे पूछे तो उसने अस्सी रुपये बताये। मैंने एक किलोमीटर के लिये अस्सी रुपये देने से मना कर दिया। तब वो बोला कि सीमा से भी दो-तीन किलोमीटर आगे काठमाण्डू की बसें मिलती हैं। चूंकि शाम के छह बज रहे थे और तांगे वाले के अनुसार सीमा बन्द होने का समय नजदीक आ रहा था, मैं पचास रुपये तय करके उसके साथ हो लिया। साथ ही यह भी तय हुआ कि जहां से काठमाण्डू की बस मिलेगी, वो मुझे वहीं ले जाकर छोडेगा। मैंने उससे पक्का बोल दिया कि काठमाण्डू वाली बस में बैठकर ही मैं तुम्हें पैसे दूंगा। अगर मुझे काठमाण्डू की बस नहीं मिली तो पैसे नहीं दूंगा। वो मान गया।

Friday, July 27, 2012

नेपाल यात्रा- गोरखपुर से रक्सौल (मीटर गेज ट्रेन यात्रा)

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11 जुलाई की सुबह छह बजे का अलार्म सुनकर मेरी आंख खुल गई। मैं ट्रेन में था, ट्रेन गोरखपुर स्टेशन पर खडी थी। मुझे पूरी उम्मीद थी कि यह ट्रेन एक घण्टा लेट तो हो ही जायेगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ठीक चार साल पहले मैं गोरखपुर आया था, मेरी ट्रेन कई घण्टे लेट हो गई थी तो मन में एक विचारधारा पैदा हो गई थी कि इधर ट्रेनें लेट होती हैं। इस बार पहले ही झटके में यह विचारधारा टूट गई।
यहां से सात बजे एक पैसेंजर ट्रेन (55202) चलती है- नरकटियागंज के लिये। वैसे तो यहां से सीधे रक्सौल के लिये सत्यागृह एक्सप्रेस (15274) भी मिलती है जोकि कुछ देर बाद यहां आयेगी भी लेकिन मुझे आज की यात्रा पैसेंजर ट्रेनों से ही करनी थी- अपना शौक जो ठहरा। इस रूट पर मैं कप्तानगंज तक पहले भी जा चुका हूं। आज कप्तानगंज से आगे जाने का मौका मिलेगा।

Wednesday, July 25, 2012

नेपाल यात्रा- दिल्ली से गोरखपुर

इस यात्रा का कोई इरादा नहीं था। अचानक इतनी जल्दी सबकुछ हुआ कि मैं समझ ही पाया कि हो क्या रहा है। पिछले महीने ही गौमुख तपोवन गया था, आठ दिन की छुट्टी ली थी, अगले महीने अगस्त में भारत परिक्रमा पर निकलना है, बारह दिन की छुट्टी चाहिये। एक शिफ्ट ड्यूटी करने वाले को छुट्टी उतनी आसानी से नहीं मिलती, जितनी कि सामान्य ड्यूटी करने वाले को मिल जाती है। इसलिये कोई मतलब नहीं बनता फिर से अचानक कई दिन की छुट्टी ले लेने का। लेकिन बडा प्रबल है पशुपतिनाथ, बुला ही लिया।
अपने एक दोस्त हैं भार्गव साहब। बडे शौकीन हैं हिमालय की ऊंचाईयों को छूने के। कभी भी फोन आ जाता है, कहते हैं कि फलां जगह चलना है। एक दिन बोले कि नीलकण्ठ चलेंगे। मैं हैरत में पड गया कि आज इस हिमालय की ऊंचाईयों वाले जीव को नीलकण्ठ की कैसे सूझ गई। यह तो ऋषिकेश के पास है, हजार मीटर के आसपास ऊंचाई है। फिर उन्होंने मेरी इस लघु-सी दिखने वाली शंका का समाधान करते हुए कहा कि भाई, एक नीलकण्ठ लाहौल में भी है। लाहौल यानी कुल्लू के पार का देश, मनाली के पार का देश, रोहतांग के पार का देश और आखिर में हिमालय के पार का देश। वाह मेरे भाई, कहां पंजा मारा है तुमने! जरूर चलेंगे।

Monday, July 23, 2012

गौमुख तपोवन का नक्शा और जानकारी

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आज गौमुख तपोवन यात्रा की आखिरी किश्त है। इसकी शुरूआत एक मजेदार वाकये से करते हैं।
पिछले दिनों मेरे पास एक फोन आया। किसी महिला की आवाज थी। उन्होंने इतनी आत्मीयता से बात की कि मैं सोच में पड गया कि ये कौन हो सकती हैं। अगर अनजान होतीं तो पहले अपना परिचय देती, फिर बात शुरू करतीं। आखिरकार मैंने झिझकते हुए पूछ ही लिया कि आप कौन हो। उन्होंने बताया कि तुम गंगोत्री गये थे। तो उत्तरकाशी में गौमुख का परमिट बनवाते समय तुम्हें एक मोटी मिली थी, मैं वही मोटी हूं।
मैं हैरान रह गया। आपको भी याद होगा कि उत्तरकाशी से गंगोत्री वाली पोस्ट को मैंने इसी किस्से से शुरू किया था कि शामली की दो मोटी-मोटी महिलाएं भी गौमुख का परमिट बनवाने के लिये वहीं थीं। वे अकेले जाना चाह रही थी जबकि मुझ समेत सभी उन्हें एक पॉर्टर ले जाने की सलाह दे रहे थे। पता नहीं उन्होंने पॉर्टर का परमिट बनवाया या नहीं लेकिन मैं उन्हें अगले दिन भोजबासा तक ढूंढता हुआ गया था। लेकिन वे नहीं मिली। उस दिन बात आई-गई हो गई। ना उन्हें मेरे बारे में मालूम था, ना कोई फोन नम्बर, ना कोई पता। और उस दिन अचानक उनका फोन आया तो हैरानी की बात ही थी।

Monday, July 16, 2012

तपोवन से गौमुख और वापसी

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11 जून 2012 की सुबह पांच बजे अचानक मेरी आंख खुली। यह कुछ चमत्कार ही था कि इतनी ठण्ड में इतनी सुबह मेरी आंख खुली हो और मैं उठ भी गया। टैण्ट से बाहर निकला, धूप नहीं निकली थी। ज्यों ही धीरे धीरे धूप निकलनी शुरू हुई तो सबसे पहले दूर पूर्व में गंगोत्री शिखरों पर दिखाई पडी। उसके बाद हमारे सामने शिवलिंग चोटी पर सूर्य किरणें पडनी शुरू हुईं। नजारा वाकई चमत्कृत कर देने वाला था। उस नजारे के सभी फोटो आप पिछली पोस्टों में देख चुके हैं।
मौनी बाबा भी जग चुके थे। कल यहां कुछ विदेशी भी रुके थे। मुझे पक्का याद नहीं कि ये कल वाले विदेशी ही थे या आज नये आ गये थे। यह आठ बजे की बात है। हमने बाबा के यहां चाय पी, नाश्ते में उबले चने फ्राई हुए बने थे। खाये नहीं, बल्कि पैक करवा लिये।

Thursday, July 12, 2012

कीर्ति ग्लेशियर

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पिछली बार मैंने बताया था कि हम मात्र एक रात के लिये ही तपोवन गये थे लेकिन वहां जाकर हम उसके मोहपाश में इतने बंध गये कि हम वहां दो रात रुके। यानी एक पूरा दिन और। फिर अपने चौधरी साहब की हालत भी काफी खराब थी, उन्हें आराम की जरुरत थी इसलिये भी एक दिन रुकना सही फैसला रहा।
10 जून 2012 की सुबह बाबाजी के यहां चाय पीकर मैंने नन्दनवन जाने का फैसला किया। बाकी सभी लोग मेरे इस फैसले के खिलाफ थे, क्योंकि नन्दनवन जाने के लिये पहले तपोवन से नीचे उतरना पडेगा, फिर खतरनाक गौमुख ग्लेशियर पार करना पडेगा और उसके बाद नन्दनवन की चढाई चढनी पडेगी। तपोवन से नन्दनवन दिखता है। ग्लेशियर के एक तरफ तपोवन है और दूसरी तरफ नन्दनवन। यह भी पता चला कि नन्दनवन में कोई आदमजात नहीं रहती और कभी कभार कोई ट्रैकिंग वाला ग्रुप आ जाता है।
मुझे यहां से निकलना जरूर था, पता नहीं कहां के लिये। दो-चार घण्टे तो मैं यहां बैठ सकता था लेकिन पूरे दिन बैठना मेरे लिये बडी मुश्किल बात थी। मैंने सबको भरोसा दिया कि नन्दनवन नहीं जाऊंगा और नन्दू को साथ लेकर चल पडा। साथ में केवल कैमरा और पानी की बोतल थी। मन में लक्ष्य नन्दनवन ही था।

Monday, July 9, 2012

तपोवन, शिवलिंग पर्वत और बाबाजी

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9 जून 2012 की दोपहर बाद ढाई बजे हम तीनों तपोवन पहुंच गये। इसकी समुद्र तल से ऊंचाई 4350 मीटर है। हमारे बिल्कुल सामने है शिवलिंग पर्वत शिखर जिसकी ऊंचाई 6000 मीटर से ज्यादा है। इसके अलावा तपोवन में जो एक और शानदार चीज है वो है अमरगंगा, जो इसकी सुन्दरता में चार चांद लगाती है।
तपोवन जाने से पहले मैंने इसके बारे में केवल इतना ही सुना था कि यह गौमुख से छह किलोमीटर आगे है। यही बात मुझे रोमांचित करती थी। अपने हिमालय अनुभवों के आधार पर मुझे पता था कि वहां इतनी ऊंचाई पर कोई वन नहीं होगा, बल्कि कोई छोटा मोटा मैदान होगा जिसे अक्सर उच्च हिमालयी क्षेत्रों में वन या बाग कह देते हैं। श्रीखण्ड महादेव के पास भी एक ऐसी ही जगह है पार्वती बाग जहां एक बडे से समतल सुरक्षित मैदान के अलावा कुछ नहीं है। और 4000 मीटर की ऊंचाई पर छोटी मोटी घास ही उग सकती है, कोई बडा पेड नहीं।

Thursday, July 5, 2012

गौमुख से तपोवन- एक खतरनाक सफर

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तपोवन के लिये चलने से पहले बता दूं कुछ बातें जो मैंने तपोवन से वापस आकर सुनीं। सबसे पहली बात तो मेरे साथ जाने वाले पत्रकार चौधरी साहब ने ही कही कि तपोवन तक जाना द्रौपदी के डांडे से भी कठिन है। अब यह द्रौपदी का डांडा क्या बला है? असल में चौधरी साहब ने उत्तरकाशी स्थित नेहरू पर्वतारोहण संस्थान (निम) से पर्वतारोहण का बेसिक कोर्स कर रखा है। यह कोर्स एक महीने का होता है और इसमें पर्वतारोहण की हर बारीकी सिखाई जाती है। ट्रेकिंग और पर्वतारोहण में फर्क होता है। सबसे बडा अन्तर तो यही है कि ट्रेकिंग में अपने ऊपर थोडा सा सामान लादकर दो-चार दिन पैदल चला जाता है। ज्यादा हुआ तो एकाध दर्रा पार कर लिया। लेकिन पर्वतारोहण इससे आगे की चीज है। उसमें ज्यादा सामान अपने ऊपर लादा जाता है और कोई चोटी फतह की जाती है। यानी जहां ट्रेकिंग खत्म हो जाती है, वहां से आगे पर्वतारोहण शुरू हो जाता है। भारत में पर्वतारोहण केवल उच्च हिमालय में ही किया जा सकता है जबकि ट्रेकिंग कहीं भी की जा सकती है। हिमालय के बाद पश्चिमी घाट की पहाडियां ट्रेकिंग के लिये जानी जाती हैं, जबकि वहां पर्वतारोहण नहीं हो सकता। कुछ भी हो, ट्रेकिंग का बाप होता है पर्वतारोहण।

Monday, July 2, 2012

भोजबासा से तपोवन की ओर

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9 जून 2012 की सुबह थी। मैं सोकर उठा तो देखा कि टैंट में अकेला ही पडा था। बाकी सब कभी के उठ चुके थे। बाहर झांका तो मौसम साफ था और धूप भी निकली थी। बिल्कुल सामने गौमुख की दिशा में गंगोत्री श्रंखला के तीनों पर्वत शिखर साफ दिखाई पड रहे थे। चौधरी साहब और नन्दू कभी के जग गये थे और चौधरी साहब अब फोटो ले रहे थे।
सात बजे मेरी आंख खुली और आठ बजे हमने गौमुख की तरफ चलना शुरू कर दिया। चलने से पहले गढवाल मण्डल वालों के यहां महा-महंगी मैगी और चाय ली। इसके अलावा आलू के तीन परांठे पैक करवा लिये और पारले-जी के पांच पैकेट भी ले लिये। गढवाल मण्डल विकास निगम वाले यहां खाने पीने की चीजों को बेहद ऊंचे दामों पर बेचते हैं। आलू का एक परांठा पचास रुपये और पारले जी का एक पैकेट जो नीचे पांच रुपये का आता है, उसे बीस रुपये का बेच रहे थे। कारण वही जो इस दुर्गम इलाके में हमेशा होता है। अच्छा हां, आज हमारा लक्ष्य गौमुख तक ना जाकर आगे तपोवन तक जाने का था। हमारा परमिट मात्र गौमुख तक के लिये था और आज उसका आखिरी दिन था। कायदे से हमें आज गौमुख देखकर गंगोत्री लौट जाना था।