Wednesday, September 28, 2011

कलकत्ता यात्रा- दिल्ली से हावडा

पिछले महीने कुछ ऐसा योग बना कि अपन को बिना छुट्टी लगाये ही चार दिन की छुट्टी मिल गई। इतनी छुट्टी और बरसात का महीना- घूमना तय था। हां, बरसात में अपना लक्ष्य गैर-हिमालयी इलाके होते हैं। दो साल पहले मध्य प्रदेश गया था जबकि पिछले साल उदयपुर। फिर दूसरी बात ये कि इन चार दिनों में कम से कम दो दिन रेल एडवेंचर में लगाने थे और बाकी दो दिन उसी ‘एडवेंचर’ वाले इलाके में कहीं घूमने में।
तुरन्त ही अपने आप तय भी कर लिया कि कोंकण इलाके में रेल आवारागर्दी करते हैं। कोंकण रेलवे यानी मुम्बई के पास रोहा से लेकर दूर मडगांव और उससे भी आगे मंगलौर तक। बाकी बचा-खुचा समय मुम्बई में बिताना तय हुआ।
सारा प्रोग्राम बना लिया कि कब यहां से निकलकर कल्याण, दीवा, रोहा, मडगांव और मंगलौर जाना है। इसी तरह वापसी का कार्यक्रम भी बन गया। दर्शन कौर धनोए जी से बात हो गई उनके घर पर अतिथि बनकर जाने की। अभी तक समुद्र नहीं देखा था, इसलिये यह भी तय कर लिया कि दर्शन जी के ऊपर मुझे समुद्र दिखाने की जिम्मेदारी होगी।

Sunday, September 25, 2011

इलाहाबाद- कानपुर- फर्रूखाबाद रेल यात्रा

इस साल रेल एडवेंचर के क्रम में मैंने अपना मकसद बनाया था कि नैरो गेज और मीटर गेज ट्रेनों में घूमना है। सतपुडा नैरो गेज, धौलपुर नैरो गेज के बाद ऐशबाग-बरेली मीटर गेज और लोहारू-सीकर मीटर गेज पर सफर कर लिया। हालांकि अभी भी काफी सारी ‘छोटी’ लाइनें बची हुई हैं। लेकिन फिर भी बडी चीजें बडी होती हैं। इस बार चक्कर लग गया इलाहाबाद से कानपुर होते हुए फर्रूखाबाद तक पैसेंजर ट्रेन से। इस ट्रेन से इस रूट पर जाना काफी टाइम से मेरी हिटलिस्ट में था।
जरा एक बार नजर घुमा लेते हैं जहां मैंने पैसेंजर ट्रेन से सफर कर रखा है। अच्छा-खासा नेटवर्क बना रखा है। जहां भी जाता हूं तो नक्शे में इसे अपडेट भी कर देता हूं। इसी नेटवर्क को मैं ‘जाट का रेल नेटवर्क’ कहता हूं। मेरी कोशिश रहती है कि जहां भी जाता हूं तो वो लाइन पहले से बने नेटवर्क से जुड जाये। इसमें एक अपवाद भी है- पठानकोट-जम्मू तवी क्योंकि पठानकोट अभी तक ‘जाट के रेल नेटवर्क’ से नहीं जुड पाया है। हालांकि जालंधर और अमृतसर दोनों अपने नापे हुए हैं लेकिन इन दोनों जगहों से पठानकोट वाली लाइन पर अभी तक जाना नहीं हुआ।

Thursday, September 22, 2011

लोहारू-सीकर मीटर गेज रेल यात्रा

रेल यात्राओं के क्रम में एक दिन कार्यक्रम बना लोहारू-सीकर मीटर गेज लाइन का। वैसे तो जयपुर से सीकर जंक्शन तक मीटर गेज जाती है। सीकर से आगे दो दिशाओं में विभक्त हो जाती हैं- एक चली जाती है चुरू और दूसरी जाती है लोहारू। चुरू और लोहारू दोनों अब बडी लाइन से सीधे दिल्ली से जुड गये हैं। रेवाडी-सादुलपुर लाइन पर लोहारू है और सादुलपुर-रतनगढ लाइन पर चुरू।
उस दिन मैं नाइट ड्यूटी करके सुबह सराय रोहिल्ला स्टेशन पर जा पहुंचा। यहां से दिल्ली सराय-सादुलपुर एक्सप्रेस (14705) चलती है जो बारह बजे लोहारू पहुंचा देती है। इस रूट पर चलने वाली सभी गाडियां अभी लगभग खाली ही दौडती हैं। इसलिये जनरल डिब्बे में आराम से लेटने वाली बर्थ मिल गई। बारह बजे का अलार्म लगाया और टाइम पर लोहारू पहुंच गया।
यहां से मीटर गेज की गाडी जयपुर स्पेशल पैसेंजर (02094) बारह चालीस पर चलती है। इस इलाके में तीन-चार साल पहले मीटर गेज लाइनों का जाल बिछा था- दिल्ली-रेवाडी-सादुलपुर-रतनगढ-बीकानेर, रेवाडी-रींगस-फुलेरा, लोहारू-सीकर-जयपुर, सादुलपुर-हिसार, सादुलपुर-हनुमानगढ-श्रीगंगानगर-सूरतगढ, चुरू-सीकर, रतनगढ-सरदारशहर, रतनगढ-डेगाना; ये सभी लाइनें मीटर गेज ही थीं। आज के टाइम में बस लोहारू-सीकर-जयपुर, चुरू-सीकर, रतनगढ-सरदारशहर और सादुलपुर-हनुमानगढ-श्रीगंगानगर लाइनें ही मीटर गेज हैं। बीकानेर बडी लाइन से दिल्ली से जुड गया है। बाकी लाइनों से जो गाडियां हटीं, उन्हें स्पेशल के तौर पर इन बची-खुची लाइनों पर डाल दिया गया है। इसलिये लोहारू-सीकर-जयपुर लाइन पर पैसेंजर गाडियों की भरमार है।

Monday, September 19, 2011

श्रीखण्ड यात्रा- तैयारी और सावधानी

श्रीखण्ड महादेव हिमाचल प्रदेश में रामपुर बुशहर के पास एक 5200 मीटर ऊंची चोटी है। इतनी ऊंचाई तक चढना हर किसी के बस की बात नहीं होती। वे लोग तो बिल्कुल भी नहीं चढ सकते जिन्हें पहाड पर कदम रखते ही हवा की कमी महसूस होने लगती है। इसकी सालाना यात्रा जुलाई में होती है। हालांकि कुछ साहसी ट्रेकर साल के बाकी समय में भी जाते हैं लेकिन वे इसी रास्ते से वापस नहीं लौटते। भाभा पास करके स्पीति घाटी में चले जाते हैं।

जब मैंने घर पर बताया कि मैं श्रीखण्ड की यात्रा पर जा रहा हूं तो पिताजी बोले कि मैं भी चलूंगा। वैसे तो मुझे बाइक से जाना था, पिताजी ने कहा कि मैं भी बाइक से जाऊंगा तुम्हारे साथ-साथ। मैंने उनके सामने एक शर्त रखी कि बाइक से तुम रहने दो, मैं भी तुम्हारे साथ बस से जा सकता हूं लेकिन पैदल रास्ते में जहां कहीं भी आपको सिर में दर्द या चक्कर आने लगेंगे, वहां से आगे नहीं जाने दूंगा। हालांकि गांव का आदमी आराम से पहाड की चढाई कर लेता है, फिर भी मैंने गम्भीरता से ये बातें कहीं, तो उन्होंने जाने से मना कर दिया।

यह बात यहां सब पर लागू होती है। बहुत सारे लोग ऐसे होते हैं जो बिना चोटी पर पहुंचे ही बीच रास्ते से वापस लौट आते हैं। और वापस लौट आने में भलाई भी है।

Friday, September 16, 2011

गुरुद्वारा श्री पांवटा साहिब (PAONTA SAHIB)

22 जुलाई 2011 की शाम को हम चारों- मैं, सन्दीप पंवार, नितिन और विपिन पांवटा साहिब (पौण्टा साहिब) में थे। पांवटा साहिब हिमाचल प्रदेश में सिरमौर (नाहन) जिले में यमुना के किनारे स्थित है।
इतिहास गुरुद्वारा श्री पांवटा साहिब
यमुना दरिया के तट पर यह वो पवित्र स्थान है जहां कलगीधर पातशाह गुरू गोविन्द सिंह जी ने नाहन रियासत में आने के बाद तुरन्त सारे क्षेत्र को देखकर नया नगर बसाने का फैसला किया और यही अपने ठहरने के लिये पहला कैम्प (14 अप्रैल 1685) लगाया। फिर इस रमणीक और अतीव सुन्दर कुदरती स्थान पर अपने लिये जिले जैसी एक इमारत बनाई। यही से ही पांवटा साहिब की नींव रखी और इसका नामकरण किया। गुरू महाराज के निवास स्थान के सामने की तरफ दीवान स्थान बनवाया, जहां रोजाना सुबह आसां-दी-वार का कीर्तन, कथा और गुरमत का विचार होता। गुरू महाराज खुद साढे चार साल संगतों को आध्यात्मिक ज्ञान बख्शीश करते रहे। इस स्थान पर गुरुद्वारे का नाम गुरुद्वारा हरिमन्दिर साहिब प्रचलित हो गया। यहां गुरू गोविन्द सिंह जी के ऐतिहासिक शस्त्र और अन्य निशानियां भी संभाली हुई थीं जो बाद में छिपा ली गईं पर कुछ निशानियां अभी तक मौजूद हैं। साहिब बाबा अजीत सिंह का जन्मस्थान भी है। होले महल्ले का त्यौहार मार्च के महीने में धूमधाम से मनाया जाता है।

Tuesday, September 13, 2011

कालसी में अशोक का शिलालेख

बहुत दिनों से सुन रखा था कि कालसी में अशोक का शिलालेख है। वही सम्राट अशोक जिसने कलिंग (उडीसा) को फतेह करने के बाद लडना छोड दिया था और बौद्ध धर्म की सेवा में लग गया था। उस समय बौद्ध धर्म भारत का राजकीय धर्म था। तो जी अशोक महाराज ने अपने धर्म, शिक्षाओं, नियम-कायदों का प्रचार किया। पूरे भारत में कई जगह शिलालेख बनवाये गये। कालसी भी लपेटे में आ गया।
और हम पर श्रीखण्ड बाबा का आशीर्वाद था कि हम रामपुर से रोहडू, आराकोट, त्यूनी, चकराता होते हुए कालसी पहुंचे और शिलालेख देखा। यह योजना हमारे परम घुमक्कड मित्र श्री सन्दीप पंवार जी के खडूस दिमाग की उपज थी नहीं तो कौन होता है जो इस उल्टे और अनजान रास्ते से यहां तक पहुंचता। रामपुर बुशहर से, रोहडू से कालसी पहुंचकर हम तो किसी को यह कहने लायक भी नहीं बचे कि भाई, कालसी का रास्ता देहरादून, पौण्टा साहिब से जाता है। अगला यह सुनते ही तपाक से पूछेगा कि क्यों, तुम गये थे क्या इस रास्ते से।

Saturday, September 10, 2011

चकराता में टाइगर फाल

अपनी श्रीखण्ड यात्रा पूरी करने के बाद हमारी योजना रामपुर से रोहडू, आराकोट, त्यूनी और चकराता होते हुए वापस आने की थी। आराकोट में हम हिमाचल छोडकर उत्तराखण्ड में घुस गये। और उस दिन त्यूनी के बाद हमारे साथ जो घटना घटी, उसे मैं पहले ही बता चुका हूं। खैर किसी तरह रास्ता ढूंढते ढूंढते सहिया पहुंचे। यह कस्बा चकराता और विकासनगर के बीच में है।
अगले दिन सुबह ही सहिया से चल पडे। करीब बीस किलोमीटर के बाद चकराता है। वैसे तो हमें कल शाम को ही यहां आ जाना था, लेकिन रास्ता भटक जाने की वजह से यहां नहीं आ सके। चकराता में घुसते ही एक चौक है। यहां से तीन दिशाओं में सडकें निकलती हैं- एक तो वही जिससे हम आये थे विकासनगर वाली, दूसरी सीधे त्यूनी और तीसरी दाहिने मुडकर चकराता के बाजार से होती हुई मसूरी।

Wednesday, September 7, 2011

जलोडी जोत के पास है रघुपुर किला

जुलाई में जब हम श्रीखण्ड जा रहे थे तो इसी यात्रा में जलोडी जोत देखने का कार्यक्रम भी बनाया। शिमला से करीब 90 किलोमीटर आगे सैंज है। यहां से एक सडक कुल्लू जाती है जो जलोडी जोत (JALORI PASS) को पार करके ही जाती है। जलोडी जोत की ऊंचाई तकरीबन 3200 मीटर है। यहां से एक रास्ता चार किलोमीटर दूर सेरोलसर झील जाता है तो इसके ठीक विपरीत दिशा में दूसरा रास्ता रघुपुर किले की तरफ जाता है।
रघुपुर किला- इसके बारे में इंटरनेट पर जानकारी बस इतनी ही मिली है जो मैंने ऊपर वाले पैरा में दी है। किसने बनाया, कब बनाया- कोई जानकारी नहीं है। लेकिन इस स्थान के कुल्लू जिले में होने के कारण ऐसा लगता है कि इसे कुल्लू के राजा ने या उसके अधीन किसी बडे अधिकारी ने ही बनवाया होगा। पहले जो भी रियासतें थीं, उन्हें एकीकृत भारत में जिले का दर्जा दे दिया गया है।
जलोडी जोत से यह करीब तीन किलोमीटर दूर है। दुकान वाले से रास्ता पूछकर हम चारों- मैं, सन्दीप पंवार, नितिन जाट और विपिन गौड निकल पडे। मैं दिल्ली से ही चार स्पेशल लठ लेकर चला था लेकिन बाकी किसी को भी लठ की महिमा पल्ले नहीं पडी। जब सेरोलसर झील गये तो मेरे अलावा सभी ने अपने नाम के लठ जोत पर एक दुकान में ही रख दिये थे। रास्ते में जब बारिश पडी और रास्ता रपटीला हो गया, तब बाकियों को लठ का गुणगान करना पडा। नतीजा यह हुआ कि रघुपुर किले पर जाते समय सबसे पहले लठ ही उठाये गये। बाइक वही दुकान के सामने खडी कर दी थी और बाकी सामान बैग, हेलमेट दुकान के अन्दर रख दिया था।

Sunday, September 4, 2011

सेरोलसर झील और जलोडी जोत

बहुत दिन पहले मैं कुल्लू जिले का नक्शा देख रहा था और उसमें भी कुल्लू का वो इलाका जो पर्यटकों में बिल्कुल भी मशहूर नहीं है लेकिन घुमक्कडों में लोकप्रिय है- तीर्थन घाटी। आमतौर पर कुल्लू जिला जहां से शुरू होता है, वहीं पर तीर्थन घाटी खत्म हो जाती है। चलो, सीधी सी बात बताता हूं। जब हम कुल्लू जाते हैं तो हमारे पास लगभग एकमात्र रास्ता मण्डी होकर ही है। मण्डी से आगे पण्डोह, हणोगी माता, औट, भून्तर और कुल्लू। यह जो औट है ना, यह मण्डी और कुल्लू की सीमा पर है। यहां से एक रास्ता ब्यास नदी के साथ-साथ कुल्लू और आगे मनाली चला जाता है जबकि दूसरा रास्ता तीर्थन नदी के साथ बंजार, शाजा होते हुए जलोडी जोत पार करके आनी, लुहरी, सैंज जा पहुंचता है। सैंज, शिमला-रामपुर मार्ग पर है।
इसी तीर्थन घाटी की हम बात कर रहे हैं। यहां कोई पर्यटक नहीं जाता, और यह जगह पर्यटकों के लायक है भी नहीं। ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क (GHNP) का नाम तो सुना होगा, उसका रास्ता भी इसी घाटी के बंजार कस्बे से जाता है। इस नेशनल पार्क में किसी को हाथी पर या जीप में बैठाकर नहीं घुमाया जाता। इसमें घूमने के लिये मजबूत पैर चाहिये, मजबूत हौसला चाहिये। मजबूत पैर और हौसला केवल घुमक्कडों की ही बपौती हैं, पर्यटकों की नहीं।
अच्छा, मैं उस दिन इसी इलाके के नक्शे को गौर से देख रहा था कि तभी सेरोलसर झील पर निगाह पडी। वैसे तो इस झील तक जाने के लिये जलोडी जोत तक सडक बनी हुई है। आगे जोत पार करके सैंज तक सडक है। हां, जोत कहते हैं दर्रे को- यानी जलोडी दर्रा (JALORI PASS)। लेकिन नक्शे में इस दर्रे का नाम नहीं लिखा था। नजदीकी गांव शाजा दिखाई दे रहा था। ऊंचाई करीब 3000 मीटर लिखी हुई थी।

Thursday, September 1, 2011

पिंजौर गार्डन

श्रीखण्ड महादेव जाते समय जब हम पिंजौर पहुंचे तो भूख काफी तेज लग रही थी। पिंजौर चण्डीगढ से करीब बीस किलोमीटर आगे शिमला रोड पर है। लेकिन अगर दिल्ली की तरफ से जा रहे हैं तो चण्डीगढ जाने की कोई जरुरत नहीं बल्कि चण्डीगढ से पहले जीरकपुर से ही रास्ता दाहिने मुडकर पिंजौर चला जाता है।
अच्छा हां, जब हमें खासकर मुझे भूख लग रही थी तो पिंजौर में एक जगह फल वालों को देखकर बाइक रुकवाई गई। केले ले लिये। केले खाते-खाते सू-सू का प्रेशर बना तो वही एक बडी सी दीवार के पास जाकर काम तमाम भी कर लिया। तभी ख्याल आया कि यार, यह दीवार तो हद से ज्यादा ऊंची और बडी लग रही है, मामला क्या है। पूछा तो पता चला कि यह गार्डन की दीवार है- पिंजौर गार्डन की। तुरन्त ही सर्वसम्मति से फैसला हो गया कि इसे भी देख डाला जाये।
बीस रुपये की पर्ची कटी और हम गार्डन के अन्दर। इसे यादवेन्द्र गार्डन भी कहते हैं। इसका डिजाइन औरंगजेब के जमाने में नवाब फिदाल खां द्वारा किया गया था। यह हरियाणा राज्य के पंचकुला जिले में पडता है और कालका से जरा सा पहले है।