Monday, August 22, 2011

श्रीखण्ड से वापसी एक अनोखे स्टाइल में

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उस सुबह हम रामपुर में थे। रामपुर बुशैहर- बुशैहर राज्य की नवीनतम राजधानी। पहले इसकी राजधानी सराहन थी जहां अक्सर बर्फीली आंधियां चला करती थीं क्योंकि सराहन एक खुली जगह पर स्थित है। इससे दुखी और परेशान होकर राजा साहब ने राजधानी बदलने का निर्णय लिया और रामपुर चले आये। रामपुर सतलुज के किनारे सराहन से बहुत नीचे एक संकरी घाटी में स्थित है। इतना नीचे कि बर्फ पडना तो दूर सेब तक नहीं होते। हम भी रात को सोये थे तो पंखा चलाना पड गया था।
सन्दीप ने इस यात्रा की योजना बनाते समय पहले ही बता दिया था कि सीधे जायेंगे तो जरूर लेकिन सीधे आयेंगे नहीं बल्कि रोहडू, त्यूनी, चकराता होते हुए आयेंगे। रामपुर से करीब दस किलोमीटर शिमला की तरफ चलने पर नोगली नामक गांव आता है। यहां से रोहडू के लिये रास्ता जाता है। वैसे रोहडू का पारम्परिक और लोकप्रिय रास्ता शिमला से आगे ठियोग से जाता है। एक रास्ता नारकण्डा से भी जाता है। नोगली से एक नदी के साथ साथ रास्ता ऊपर चढता है, सडक बढिया है। करीब दस किलोमीटर के बाद तकलेच गांव आता है। हम रामपुर से बिना कुछ खाये पीये ही चले थे। योजना बनाई कि तकलेच में कुछ खायेंगे। लेकिन जब देखा कि तकलेच गांव इस सडक से करीब एक किलोमीटर हटकर है, तो खाना आगे किसी गांव में स्थानांतरित कर दिया। यहां पर सराहन से भी एक सडक आती है। इसी सराहन वाली सडक पर करीब एक किलोमीटर दूर तकलेच है।

Friday, August 19, 2011

श्रीखण्ड यात्रा- भीमद्वारी से रामपुर

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दिनांक 21 जुलाई और दिन था गुरूवार। हम तीनों- मैं, सन्दीप और विपिन श्रीखण्ड यात्रा लगभग पूरी करके भीमद्वारी में एक टेण्ट में बैठे थे। लगभग इसलिये कि श्रीखण्ड दर्शन तो हो चुके थे बस यात्रा के आधार स्थल जांव पहुंचना था। जांव पहुंचते ही यह यात्रा पूरी हो जाती। हम सुबह पार्वती बाग से दो-दो परांठे खाकर चले थे, शरीर के साथ साथ दिमाग को भी झकझोर देने वाली चढाई और फिर उसी रास्ते से उतराई- सोलह किलोमीटर में हमने बारह घण्टे लगा दिये थे। इतने टाइम तक मात्र दो-दो परांठों में गुजारा करना कितना कठिन है- इसका अन्दाजा लगाना मुश्किल नहीं है। वो तो अच्छा था कि सुबह भीमद्वारी से चलते समय मैंने बिस्कुट के दो बडे पैकेट ले लिये थे और उससे भी अच्छा ये हुआ कि सन्दीप और विपिन मुझसे मीलों आगे चल रहे थे- बिस्कुटों का मालिक मैं ही था और मैंने मालिक धर्म पूरी तरह निभाया भी। सन्दीप एक ऊंट की तरह है जो रेगिस्तान में भी बिना खाये पीये कई दिनों तक रह सकता है। उसके साथ बेचारे विपिन की क्या हालत हुई होगी, सिर्फ वही जानता होगा।

Saturday, August 13, 2011

श्रीखण्ड महादेव के दर्शन

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तारीख थी 20 जुलाई 2011 और दिन था बुधवार। आज हमें श्रीखण्ड महादेव के दर्शन करके वापस लौटना था। पार्वती बाग में दो परांठे खाकर हम आगे चल पडे। इस यात्रा को चार मुख्य भागों में बांटा जा सकता है- जांव से बराटी नाले तक करीब पांच किलोमीटर तक बिल्कुल साधारण सीधा रास्ता जो खेतों और आखिर में घने जंगल से होकर नदी के साथ साथ जाता है, बराटी नाले से काली घाटी तक करीब आठ किलोमीटर की एकदम सीधी चढाई जो घने जंगल से होकर है आखिर के करीब डेढ किलोमीटर छोडकर, काली घाटी से पार्वती बाग तक करीब सोलह किलोमीटर जो कहीं चढाई कहीं उतराई वाला है और चारों ओर हरी मखमली घास से होकर जाता है, पार्वती बाग से श्रीखण्ड तक जो करीब छह किलोमीटर का है पूरा रास्ता चढाई वाला है और बडे बडे पत्थरों से भरा है।

Monday, August 8, 2011

श्रीखण्ड महादेव यात्रा- भीमद्वारी से पार्वती बाग

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20 जुलाई 2011 दिन बुधवार। हम तीन जने श्रीखण्ड अभियान पर थे और उस दिन सुबह सुबह छह बजे के करीब भीमद्वारी से चल पडे। हमें बताया गया था कि यहां से श्रीखण्ड करीब 8 किलोमीटर है जिसका आना-जाना शाम तक बडे आराम से हो जायेगा। यहां से करीब दो किलोमीटर दूर पार्वती बाग है। आज की पोस्ट में ज्यादा ना चलते हुए पार्वती बाग तक ही जायेंगे।
करीब आधा किलोमीटर आगे एक शानदार झरना है जिसे पार्वती झरना कहते हैं। यह कुदरती कलाकारी का एक ऐसा नमूना है जिस पर से नजर हटती ही नहीं हैं। वाकई इस इलाके में कुदरती कलाकारी जबरदस्त रूप से बिखरी पडी है।
सन्दीप और विपिन मुझसे आगे निकल गये थे। वे मिले पार्वती बाग में- परांठे खा रहे थे। इधर मैं भी ठहरा परांठों का भूखा। जब तक मैं पार्वती बाग पहुंचा, दोनों अपने हिस्से के परांठे खत्म कर चुके थे। मेरे पहुंचते ही टैण्ट वाले से बोले कि ओये, हमारा बन्दा आ गया है, जो भी कुछ खाने को मांगे, दे देना, हम चलते हैं आगे, पैसे नीरज देगा। पूरी यात्रा में खजांची मैं ही रहा था। एक डायरी में खर्चा लिख लेता था।

Saturday, August 6, 2011

श्रीखण्ड महादेव यात्रा- थाचडू से भीमद्वार

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19 जुलाई 2011 दिन मंगलवार। हमारी श्रीखण्ड यात्रा जारी थी। मुझे थाचडू से पहले जबरदस्ती उठाया गया। ना खाने को दिया गया, ना पीने को। रात सोते समय मैंने टैण्ट वाले से पक्की बात कर ली थी कि सुबह को उठते ही चाय और परांठे चाहिये, तभी आंख खुलेगी। लेकिन सुबह जब सन्दीप ने उठाया और मैंने चायवाले से कहा कि भाई, चाय परांठे, तो बोला कि चूल्हा ठण्डा पडा है, घण्टे भर से पहले नहीं बनेंगे।
साढे छह बजे हम यहां से चल दिये। नितिन के पैर में कोई सुधार नहीं हुआ था, इसलिये उसे यही छोड दिया गया। साथ ही यह भी कह दिया कि तू नीचे चला जा और परसों हमें जांव में ही मिलना। उसके चेहरे पर खुशी देखने लायक थी क्योंकि उसके लिये यात्रा करने से ज्यादा जरूरी गर्लफ्रेण्डों से बात करनी थी। हालांकि वो दो बच्चों का बाप भी है।
साढे सात बजे थाचडू पहुंचे। थाचडू को हम खचेडू कहते थे। हमारा कल का लक्ष्य ‘खचेडू’ ही था लेकिन लाख जोर लगाने के बाद भी हम यहां तक नहीं पहुंच सके थे। यहां श्रीखण्ड सेवा समिति वालों का लंगर भी लगा था, हलवा-चाय और आलू की सब्जी के साथ पूरी मिल रही थी। श्रीखण्ड सेवा समिति पूरी यात्रा में तीन जगह- सिंहगाड, थाचडू और भीमद्वारी में निशुल्क लंगर और आवास मुहैया कराती है।

Monday, August 1, 2011

श्रीखण्ड महादेव यात्रा- जांव से थाचडू

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तारीख थी 18 जुलाई और दिन था सोमवार। यात्रा भी शिवजी की और दिन भी शिवजी का। हम चार जने- मैं, सन्दीप, नितिन और विपिन श्रीखण्ड महादेव की यात्रा पर थे और यात्रा के आधार स्थल जांव पहुंच गये थे। जांव से दोपहर बाद ठीक दो बजे हमने श्रीखण्ड के लिये प्रस्थान कर दिया। मेरे द्वारा की गई इस कठिनतम यात्रा से पहले कुछ बातें थीं जिनका जिक्र करना जरूरी है।
हम दिल्ली से ही बाइक पर आये थे। कल यानी 17 तारीख को हमने पूरा दिन जलोडी जोत (JALORI PASS) पर बिताया। रामपुर बुशैहर से कुल्लू जाने वाली सडक जलोडी जोत को पार करके ही जाती है। इसकी ऊंचाई समुद्र तल से 3120 मीटर है। इससे पांच किलोमीटर दूर एक छोटी सी झील है- सेरोलसर झील। इसके दूसरी तरफ करीब तीन किलोमीटर दूर एक किला है- रघुपुर किला। दोनों जगहें पैदल नापी गईं। यहां जाने का हमारा मकसद था केवल एक्लीमेटाइजेशन यानी शरीर को पहाडों के अनुकूल बनाना। आखिर श्रीखण्ड की ऊंचाई 5200 मीटर से ज्यादा है। दिल्ली में रहने वाला जब अचानक इतनी ऊंचाई पर पहुंचेगा तो शरीर के आन्तरिक नाजुक हिस्सों पर असर पडना तय है। इस असर को कम से कम करने के लिये हम जलोडी जोत गये।