Wednesday, June 29, 2011

करेरी यात्रा पर गप्पू और पाठकों के विचार

करेरी यात्रा मेरे यात्रा इतिहास की बहुत खास यात्रा रही। यह पहली ऐसी यात्रा थी जहां मैं धार्मिक स्थान पर न जाकर खालिस घुमक्कड स्थान पर गया। हर बार अपने साथियों से कुछ ना कुछ शिकायत रहती थी, लेकिन इस बार गप्पू की तरफ से कोई शिकायत नहीं है। बन्दे ने पूरी यात्रा में जमकर साथ दिया। गप्पू अपने घर से एक तरह से भागकर आया था। घरवाली को बताया था कि करेरी झील कैलाश मानसरोवर वाली झील के बाद दूसरी पवित्र झील है।

पूरे यात्रा वृत्तान्त में मैंने गप्पू की पहचान छुपाये रखी। यह उन्हीं की इच्छा थी। वह एक ब्लॉगर भी है। उनका ब्लॉग भी है जिसका लिंक मुझे मालूम भी है लेकिन गप्पू के कहने पर मैंने कहीं उसका इस्तेमाल नहीं किया। यही कारण है कि गप्पू ने हर पोस्ट में गप्पू जी के नाम से अपने अनुभव भी कमेण्ट के रूप में लिखे हैं। मैंने उनसे कभी नहीं कहा कि भाई, पोस्ट छप गई है, आओ और कमेण्ट कर जाओ। आइये गप्पू समेत कुछ खास कमेण्टों पर निगाह डालते हैं:

Monday, June 27, 2011

करेरी यात्रा का कुल खर्च: 4 दिन, 1247 रुपये

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मैं और गप्पू करेरी झील के लिये दिल्ली से 23 मई की सुबह शाने पंजाब एक्सप्रेस से निकले थे। गप्पू राजस्थान से आया था। उसका राजस्थान से दिल्ली आने-जाने का खर्चा इस लिस्ट में शामिल नहीं है। इसमें जो भी खर्चा दिखाया गया है, हमारा वास्तव में उतना ही खर्चा हुआ। इससे ज्यादा एक रुपया भी खर्च नहीं किया।
23 मई 2011
नई दिल्ली से अम्बाला (ट्रेन से)- 124 रुपये
ट्रेन में चाय- 20 रुपये
ट्रेन में भुनी दाल- 20 रुपये
अम्बाला स्टेशन पर नहाना- 10 रुपये
अम्बाला से चण्डीगढ (बस से)- 80 रुपये
सेक्टर 17 से सेक्टर 43 (बस से)- 20 रुपये
43 बस अड्डे पर चाऊमीन और कोल्ड ड्रिंक- 110 रुपये

Friday, June 24, 2011

करेरी झील से वापसी

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मई 2011 को सुबह लगभग दस बजे मैं और गप्पू करेरी झील से वापस चल पडे। हमें यहां आते समय पता चल गया था कि धर्मशाला के लिये आखिरी बस घेरा से शाम चार बजे मिलेगी। यहां से करेरी गांव 13 किलोमीटर दूर है। करेरी गांव से घेरा गांव लगभग साढे तीन किलोमीटर है। पूरी यात्रा पैदल ही है। हमें चार बजे से पहले ही घेरा पहुंच जाना था। वैसे तो हमारे पास नोली पहुंचने का भी विकल्प था जहां से सीधे शाहपुर के लिये बसें मिल सकती थीं और नोली करेरी के मुकाबले पास भी था। झील से कुछ नीचे उतरकर एक रास्ता करेरी चला जाता है और एक नोली। लेकिन हमारे पास स्लीपिंग बैग थे जिन्हें हम किराये पर लाये थे और वापस भी लौटाने थे। इसलिये करेरी और घेरा तक पैदल चलना हमारी मजबूरी थी। हम पिछले दो दिनों से जबरदस्त पैदल चलकर इतने थक गये थे कि आज बिल्कुल भी चलने का मन नहीं था।

Monday, June 20, 2011

करेरी झील की परिक्रमा


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26 मई 2011 की सुबह सुबह मेरी आंख खुली। जमीन कुछ ऊबड-खाबड सी लगी। अच्छा हां, जब मैं सोता हूं तो तसल्ली से सोता हूं। यह भी नहीं पता चलता कि सोने के दौरान क्या हो रहा है। और जब उठता हूं तो धीरे-धीरे इस दुनिया में आता हूं। ऐसा ही उस दिन हुआ। धीरे-धीरे याद आने लगा कि मैं करेरी झील के किनारे हूं। तभी गप्पू की आवाज आयी- ओये, उठ जा। देख सूरज निकल गया है। साले, वापस भी जाना है। और जब स्लीपिंग बैग से मुंह बाहर निकाला तो वाकई सूरज निकला हुआ था।

कल शाम को सात बजे जब हम यहां आये थे तो दूर दूर तक कोई आदमजात नहीं थी। झील के किनारे ही एक छोटा सा मन्दिर बना हुआ है। मन्दिर के बराबर में तीन टूटे हुए से कमरे हैं। उस समय आंधी-तूफान पूरे जोरों पर था। बारिश पड रही थी। ओले भी गिर रहे थे। जैसे ही हवा का तूफान आता तो लगता कि ले भाई, आज गये काम से। कमरों में केवल तीन तरफ ही दीवारें थीं। पीछे वाली दीवार में बडा सा छेद भी था। ऊपर टीन पडी थी। बराबर वाले कमरे की टीन उधड गई थी। जब भी हवा चलती और उससे खड-खड की आवाज आती तो लगता कि ऊपर पहाड से पत्थर गिर रहे हैं।

Friday, June 17, 2011

करेरी झील के जानलेवा दर्शन

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25 मई 2011 की दोपहर थी। हम करेरी झील की तरफ जा रहे थे। रास्ते में एक जगह हमें केरल के किसी सेण्ट्रल स्कूल के बच्चे मिले। वे क्षेत्रीय पर्वतारोहण केन्द्र, धर्मशाला की तरफ से करेरी झील देखने जा रहे थे। उनकी कुल चार दिन की ट्रैकिंग थी। आज उन्हें झील से कम से कम पांच किलोमीटर पहले रुकना था, इसलिये वे मस्ती में चल रहे थे। हमें झील पर ही रुकना था, इसलिये हम भी उनके साथ धीरे-धीरे ही चल रहे थे। हमारा कोई नामलेवा तो था नहीं कि हमें नियत समय पर पहुंचकर वहां हाजिरी देनी थी। कभी भी पहुंचकर बस सो जाना था। स्लीपिंग बैग थे ही हमारे पास।

केरल वालों में पचास बच्चे थे, कुछ टीचर थे, एक गाइड था। सभी फर्राटेदार हिन्दी बोल रहे थे। गप्पू ने सोचा कि ये दक्षिण भारतीय हैं, हिन्दी नहीं जानते होंगे, उनसे अंग्रेजी में बात करने लगा। मैंने कहा कि ओये अंग्रेज, हिन्दी में बोल, ये लोग हिन्दी जानते हैं। कहने लगा कि नहीं मैं तो अपनी अंग्रेजी टेस्ट कर रहा हूं। वैसे भी इन्हें हिन्दी में दिक्कत होती होगी। तभी केरल की एक टीचर ने कहा कि हम सभी हिन्दी बहुत अच्छी तरह से जानते हैं। गप्पू सन्न।

Tuesday, June 14, 2011

करेरी गांव से झील तक

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25 मई 2011 की सुबह थी, जब मैं और गप्पू अपनी घुमक्कडी को नये आयाम देने करेरी गांव में सोकर उठे। आज हमें यहां से 13 किलोमीटर दूर ऊपर पहाडों में झील तक जाना था। हालांकि शलभ के अनुसार करेरी गांव से इसकी दूरी 10 किलोमीटर है। गांव वाले ज्यादा बताते हैं। यह झील दुनिया के किसी भी पर्यटन नक्शे में नहीं है। यह झील है केवल घुमक्कडों के नक्शे में। इस झील का ना तो कोई धार्मिक महत्व है, हालांकि झील के किनारे एक छोटा सा मन्दिर बना है। ना ही किसी आम पर्यटन स्थल की तरह है। जिनके पैरों में चलने की खाज होती रहती है, वे ही लोग इस झील को जानते हैं और वे ही यहां तक जाते भी हैं।

Saturday, June 11, 2011

करेरी यात्रा- गतडी से करेरी गांव

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नड्डी एक पहाडी की चोटी पर बसा है। इससे एक तरफ काफी नीचे उतरने पर गतडी गांव आता है। गतडी से और नीचे उतरने पर एक पहाडी नदी (खड्ड) आती है। हम 24 मई 2011 की शाम चार बजे उस नदी के किनारे थे और करेरी जाने वाले रास्ते को ढूंढ रहे थे। हमें ये भी नहीं पता था कि अभी करेरी कितना दूर है। कितना टाइम लगेगा। वहां कुछ रहने-खाने का भी हो जायेगा या नहीं। फिर भी हमने अपना लक्ष्य बनाया था कि छह बजे तक करेरी पहुंच जाना है। आखिरकार हमें खड्ड पार करके दूसरी तरफ एक हल्की सी पगडण्डी ऊपर जाती दिखाई दी। हम उसी पर हो लिये।

Wednesday, June 8, 2011

करेरी यात्रा- मैक्लोडगंज से नड्डी और गतडी

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24 मई 2011 की दोपहर बाद मैं और गप्पू मैक्लोडगंज से नड्डी की ओर चल पडे। पक्की सडक बनी है। वैसे तो नड्डी तक बसें भी चलती हैं लेकिन अगली बस दो घण्टे बाद थी। इसलिये सोचा गया कि पैदल ही चलते हैं, जब तक बस आयेगी तब तक तो पहुंच भी जायेंगे। मैक्लोडगंज से नड्डी की दूरी छह किलोमीटर है।

चार किलोमीटर के बाद डल झील आती है। यह एक कृत्रिम झील है जो आजकल सूखी हुई है। यह चारों ओर से ऊंचे-ऊंचे देवदार के पेडों से घिरी है। अगर इसमें पानी होता तो यह बडी ही मदमस्त लगती। डल झील से दो किलोमीटर आगे नड्डी गांव है। पक्की मोटर रोड नड्डी तक ही बनी है। यह गांव भी कांगडा जिले के पर्यटन नक्शे में है। यहां विदेशियों का आना-जाना लगा रहता है। हालांकि पूरे कांगडा से धौलाधार की बर्फीली चोटियां दिखती हैं, इसलिये नड्डी से भी दिखती हैं। यह गांव एक पहाड की चोटी पर बसा है। यही कारण है कि बर्फीली चोटियों को देखने के लिये यह बढिया जगह है।

Saturday, June 4, 2011

भागसू नाग और भागसू झरना, मैक्लोडगंज

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हमारी करेरी झील की असली यात्रा शुरू होती है धर्मशाला से। 23 मई की आधी रात तक मैं, गप्पू और केवल राम योजना बनाने में ही लगे रहे। केवल राम ने पहले ही हमारे साथ जाने से मना कर दिया था। अब आगे का सफर मुझे और गप्पू को ही तय करना था। गप्पू जयपुर का रहने वाला है। एक दो बार हिमालय देख रखा है लेकिन हनीमून तरीके से। गाडी से गये और खा-पीकर पैसे खर्च करके वापस आ गये। जब मैंने करेरी झील के बारे में ‘इश्तिहार’ दिया तो गप्पू जी ने भी चलने की हामी भर दी थी। सुबह कश्मीरी गेट पर जब मैंने गप्पू को पहली बार देखा तो सन्देह था कि यह बन्दा करेरी तक साथ निभा पायेगा। क्योंकि महाराज भारी शरीर के मालिक हैं।

Wednesday, June 1, 2011

चल पडे करेरी की ओर

क्या चीज है हिमालय भी!! जितनी बार जाओ, उतना ही बुलाता है। मुझे इसकी गुफाएं और झीलें बहुत आकर्षित करती हैं। पिछली तीन यात्राओं- मदमहेश्वर, अल्मोडा और केदारनाथ के दौरान मैं उत्तराखण्ड में था तो इस बार हिमाचल का नम्बर लगना तय था। इसी नम्बर में करेरी झील आ गई।
करेरी झील कांगडा जिले में है। धौलाधार की बर्फीली पहाडियों पर समुद्र तल से 3000 मीटर की ऊंचाई पर। जाडों में जम भी जाती होगी। गर्मियों में झील के आसपास बर्फ भी रहती है। मैक्लोडगंज से इसका पैदल रास्ता जाता है। बस, इतना ही सुना था मैंने इसके बारे में। जब से सुना था, इसे देखने की बडी इच्छा थी।
ब्लॉगिंग से पीएचडी कर रहे केवलराम भी धर्मशाला में ही रहते हैं। जब रोहतक ब्लॉगर सम्मेलन में उनसे मुक्कालात मतलब मुलाकात हुई तभी तय हो गया था कि करेरी झील तक केवल भी साथ देंगे। इस सफर में एक साथी और मिल गये- जयपुर के गप्पू जी। नाम तो इनका कुछ और ही होगा लेकिन सभी इन्हें गप्पू ही बुलाते हैं तो मैं भी गप्पू ही कहने लगा।