Sunday, May 29, 2011

धौलपुर नैरो गेज

अभी पिछले दिनों की बात है कि आपना दिमाग फिर गया और मैं धौलपुर चला गया। कारण था कि धौलपुर से जो छोटी लाइन की गाडी चलती है, उसमें सफर करना है। कोई समझदार इंसान आपातकाल को छोडकर कभी गर्मियों में राजस्थान जाने की हिम्मत नहीं जुटा सकता। दिल्ली से आगरे की बस पकडी, सुबह तक आगरा। यहां से सुबह 06:20 पर झांसी पैसेंजर (51832) चलती है। यह घण्टे भर में धौलपुर पहुंचा देती है। मैंने इसी सेवा का सहारा लिया था।

धौलपुर से 10:40 पर नैरो गेज यानी छोटी लाइन की गाडी तांतपुर के लिये निकलती है। इस समय तक यहां काफी गर्मी बढ गई थी। रही-सही कसर एटीएम ने पूरी कर दी। दिल्ली से चलते बखत मैंने ध्यान नहीं दिया कि जेब में लक्ष्मी जी है भी कि नहीं। नतीजा? धौलपुर तक सब खत्म। वापस आगरा जाने के भी लाले पड गये तो धौलपुर में एटीएम खोज शुरू हुई। स्टेशन वैसे ही छोटा सा है। यहां कोई एटीएम नहीं है। वैसे तो स्टेट बैंक के बारे में कहा जाता है कि जहां पांच आदमी भी मूतते हों वहां भी एटीएम मिल जाता है लेकिन स्टेशन पर कुछ नहीं।

Wednesday, May 25, 2011

केदारनाथ-तुंगनाथ का कुल खर्चा- 1600 रुपये

मेरी केदारनाथ यात्रा को पढने के लिये यहां क्लिक करें। मैं केदारनाथ के अलावा त्रियुगी नारायण और तुंगनाथ भी गया। दिल्ली से निकलने के बाद और घूम-घामकर वापस दिल्ली तक कुल कितना खर्चा हुआ, आज यह बताता हूं। मेरे साथ सिद्धान्त भी था।

19 अप्रैल 2011
मोहन नगर से हरिद्वार बस से = 244 रुपये
हरिद्वार से श्रीनगर बस से = 240 रुपये
ऋषिकेश में एक दर्जन केले = 40 रुपये
देवप्रयाग में लंच = 35 रुपये
श्रीनगर से रुद्रप्रयाग बस से = 60 रुपये
रुद्रप्रयाग से गुप्तकाशी जीप से = 100 रुपये

Sunday, May 22, 2011

तुंगनाथ से वापसी भी कम मजेदार नहीं

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21 अप्रैल 2011 को दोपहर बाद तीन बजे मैं तुंगनाथ से नीचे उतरकर चोपता पहुंच गया। मुझे पता चल गया था कि चोपता से ऊखीमठ जाने वाली आखिरी बस तीन बजे के आसपास ही निकलती है। वैसे तो मेरा टारगेट ढाई बजे तक ही चोपता आ जाने का था लेकिन तुंगनाथ में हुई बर्फबारी के मजे लेने के चक्कर में मैं आधा घण्टा लेट हो गया। चोपता पहुंचकर पता चला कि ऊखीमठ वाली बस अभी नहीं गई है।

साढे तीन बजे बस आई। ड्राइवर को नाश्ता करना था इसलिये पन्द्रह मिनट खडी रही। आखिरी बस होने की वजह से फुल भरी हुई थी इसलिये ताला तक खडे होकर जाना पडा। ताला वो जगह है जहां से देवरिया ताल के आधार स्थल सारी गांव के लिये सडक जाती है। सारी से देवरिया ताल तक ढाई किलोमीटर पैदल रास्ता है। यह बस गुप्तकाशी जा रही थी। मैंने टिकट ले लिया कुण्ड तक का। ऊखीमठ और गुप्तकाशी के बिल्कुल बीच में है कुण्ड। कुण्ड में एक तिराहा है जहां से ऊखीमठ, गुप्तकाशी और रुद्रप्रयाग के लिये सडक जाती है। मैं जल्दी से जल्दी रुद्रप्रयाग पहुंच जाना चाहता था। वैसे मेरे पास अभी कल का दिन भी था लेकिन तीन चार दिनों से लगातार सफर कर-कर के बहुत थक गया था और जल्दी से जल्दी दिल्ली लौट जाना चाहता था। सिद्धान्त भी साथ नहीं था।

Thursday, May 19, 2011

चंद्रशिला और तुंगनाथ में बर्फबारी

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22 अप्रैल 2011 को दोपहर होने से पहले मैं चोपता से तुंगनाथ पहुंच गया। तुंगनाथ पंचकेदारों में तीसरा केदार है। इसे दुनिया में सबसे अधिक ऊंचाई पर स्थित हिन्दू मन्दिर भी माना जाता है। इसकी समुद्र तल से ऊंचाई 3680 मीटर है। इंटरनेट का जमाना है- एक जगह मैंने इसकी ऊंचाई 3829 मीटर भी लिखी देखी है।

तब तक तुंगनाथ के कपाट नहीं खुले थे। चारों धामों की तरह यहां भी कपाट सिस्टम है और तुंगनाथ की डोली मक्कूमठ नामक गांव के मन्दिर में रखी जाती है। जब ऊखीमठ से चोपता जाते हैं तो रास्ते में एक तिराहा पडता है। यहां से तीसरी सडक मक्कूमठ जाती है।

Monday, May 16, 2011

तुंगनाथ यात्रा

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21 अप्रैल 2011 को जब हम त्रियुगी नारायण में बैठे चाय पी रहे थे तो चायवाले ने अकस्मात ही कहा कि वो देखो, वहां तुंगनाथ है। उसके ‘वो देखो’ इन दो शब्दों में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी लेकिन जैसे ही कानों में पडा कि ‘वहां तुंगनाथ है’ तो तुरन्त गर्दन उधर घूम गई। दूर- बहुत दूर नीली पहाडियां दिख रही थीं। उनके बाये हिस्से में कुछ बर्फ भी दिखाई दे रही थी। लेकिन चायवाले ने बताया कि बरफ के दाहिने वाली चोटी तुंगनाथ है। इसका मतलब था कि तुंगनाथ में बर्फ नहीं है।

तुंगनाथ पूरी दुनिया में सबसे अधिक ऊंचाई पर स्थित हिन्दू मन्दिर है। इसकी समुद्र तल से ऊंचाई 3680 मीटर है। यह पंचकेदारों में तीसरा केदार है। हम कल पहले केदार यानी केदारनाथ में थे और वहां दस फीट तक बर्फ थी तो सोचा था कि तुंगनाथ इससे भी अधिक ऊंचाई पर है तो वहां भी खूब बर्फ होगी। शायद ना भी जा पायें। लेकिन अब देखने से लग रहा है कि तुंगनाथ में बर्फ नहीं है तो जा सकते हैं। बस, तभी इरादा बना लिया सुबह सात बजे गुप्तकाशी से गोपेश्वर जाने वाली बस पकडने का।

Saturday, May 14, 2011

त्रियुगी नारायण मन्दिर- शिव पार्वती का विवाह मण्डप

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21 अप्रैल की सुबह आठ बजे मैं सोकर उठा। पहले पहल तो यकीन ही नहीं हुआ कि मैं गौरीकुण्ड में हूं। बराबर में ही मंदाकिनी बह रही थी तो खूब आवाज कर रही थी। सोचता रहा कि क्या बाहर इतनी बारिश हो रही है। कल मैंने और सिद्धान्त ने 50 किलोमीटर जीप से गुप्तकाशी से गौरीकुण्ड आने के बाद 28 किलोमीटर गौरीकुण्ड से केदारनाथ और साथ ही साथ वापसी भी की। 28 किलोमीटर की ट्रेकिंग मैंने हिमालय में पहले कभी नहीं की थी। जितना थक सकते थे, थक गये थे। मुझे उम्मीद नहीं थी कि सिद्धान्त भी थक सकता है लेकिन वो भी चूर था।

कल सोते समय एक बार मन में आया था कि सुबह पहली गाडी से घर को निकल पडेंगे। लेकिन जब आज सुबह आंख खुली तो घुमक्कडी कीडा भी जाग गया था। सोचा कि घर वापसी से हमारे अगले तीन दिन खराब हो जायेंगे क्योंकि हमें 24 तारीख को वापस आना था। मुंह धोते ही सीधा त्रियुगी नारायण दिमाग में आया। सिद्धान्त को बताया तो बन्दा मुझसे भी पहले तैयार हो गया। हालांकि कल केदारनाथ से वापस उतरते समय वो गिर पडा था और घुटने में हल्की चोट भी आई थी।

Saturday, May 7, 2011

केदारनाथ में बर्फ और वापस गौरीकुण्ड

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20 अप्रैल 2011 की सुबह गुप्तकाशी से चलकर दोपहर ढाई तीन बजे तक हम केदारनाथ पहुंच गये थे। हमें क्या पता था कि वहां इतनी बर्फ मिलेगी कि मन्दिर तक पहुंचने के भी लाले पड जायेंगे। हमारा कार्यक्रम वासुकी ताल जाने का भी था- या तो आज ही जाते या फिर कल सुबह। दसियों फीट बर्फ में वासुकी ताल जाना हमारे लिये बिल्कुल असम्भव बात थी। उधर सिद्धान्त का इरादा आज ही वासुकी ताल भी देखकर वापस गौरीकुण्ड पहुंच जाने का था। मैं उसके इस इरादे के खिलाफ था क्योंकि ऐसा करने से सबसे पहली बात कि हम भयंकर रूप से थक जाते, दूसरी बात हमारे पास एक दिन और बढ जाता। उस एक दिन में हम कहां जाते- यह भी सोचना पडता।

Wednesday, May 4, 2011

केदारनाथ में दस फीट बर्फ

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20 अप्रैल 2011 को दोपहर तक हम रामबाडा पार कर चुके थे। रामबाडा गौरीकुण्ड-केदारनाथ पैदल मार्ग के बिल्कुल बीचोंबीच पडता है। आगे के सफर को पढने से पहले यह जान लें कि आज से 17 दिन बाद यानी 7 मई को केदारनाथ के कपाट खुलेंगे। कपाट खुलने के बाद यहां श्रद्धालुओं का आना-जाना बढ जाता है। नहीं तो हम जैसे इक्का-दुक्का सिरफिरे ही आते हैं। हमारा कपाट खुलने से पहले यहां आने का मकसद कोई श्रद्धा-भक्ति नहीं है। दोनों बंदे कम भीडभाड और कम खर्च करने वाले हैं और इन कार्यों के लिये इससे बढिया मौसम कोई नहीं। और अगर हम कपाट खुलने के बाद आते तो कुदरत के उस चमत्कार से बच जाते जो हमने आज देखा। पूरी दुनिया में उंगलियों पर गिनने लायक लोग ही होंगे जिन्होंने केदारनाथ में यह नजारा देखा होगा। अगर आपमें से किसी ने ऐसा नजारा देखा हो तो बताना जरूर।