Wednesday, October 27, 2010

सोनमर्ग में खच्चरसवारी

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जब जुलाई में हम छह जने अमरनाथ गये थे, तो वापसी बालटाल के रास्ते से की। बालटाल से आठ किलोमीटर श्रीनगर की ओर चलने पर सोनमर्ग आता है। यात्रा करते-करते हम सभी इतने थक गये थे कि सोनमर्ग से आगे बढ ही नहीं पाये। पच्चीस सौ रुपये में एक कमरा ले लिया। तीन तो फैल गये डबलबैड पर और बाकी तीन अतिरिक्त गद्दे बिछवाकर नीचे सो गये। सुबह आराम से उठे। उठते ही एक खबर मिली कि श्रीनगर में पिछले पन्द्रह दिनों से लगा कर्फ्यू हट गया है। अब हमारे योजनाकर्त्ताओं के दिमाग में केवल एक बात जरूर भर गयी कि आज रात श्रीनगर में हाउसबोट में ही काटेंगे। सोनमर्ग से श्रीनगर की दूरी लगभग अस्सी किलोमीटर है। यानी ढाई-तीन घण्टे लगेंगे। इसलिये आज यहां से दोपहर बाद चलेंगे। दोपहर तक घुडसवारी करते हैं।

Monday, October 25, 2010

50000 किलोमीटर की रेल यात्रा

हो गयी 50000 किलोमीटर की रेल यात्रायें पूरी। इसके लिये मुझे पूरे 2021 दिन तक ट्रेनों में धक्के खाने पडे। 2021 दिन यानी 289 सप्ताह यानी 67 से भी ज्यादा महीने यानी साढे पांच साल। पहली बार मैं ट्रेन में 8 अप्रैल 2005 को बैठा था।
जिस तरह क्रिकेट के रिकॉर्ड दिखाये जाते हैं, ठीक उसी तरह आज मैं भी अपनी रेल यात्राओं के रिकॉर्ड दिखा रहा हूं:

Wednesday, October 13, 2010

सोनामार्ग (सोनमर्ग) के नजारे

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अमरनाथ यात्रा के क्रम में जब हम दर्शन करके वापस बालटाल पहुंचे तो वहां से निकलते-निकलते शाम हो गयी थी। हममें से ज्यादातर पहली बार कश्मीर आये थे, इसलिये एक-दो दिन कश्मीर में रुकना भी चाहते थे। इरादा तो श्रीनगर में रुकने का था, लेकिन पिछले कई दिनों से वहां कर्फ्यू लगा हुआ था। अब तय हुआ कि सोनमर्ग में रुकेंगे।

सोनमर्ग बालटाल से आठ किलोमीटर दूर श्रीनगर वाले रास्ते पर है। इसे सोनामार्ग कहते हैं, जो आजकल सोनमर्ग बोला जाता है। यह इलाका घाटी के मुकाबले बिल्कुल शान्त है, इसलिये यहां रुकने में डर भी नहीं लग रहा था। जिस होटल में हम ठहरे थे, उसका मालिक एक हिन्दू था। उस होटल में काम करने वाला बाकी सारा स्टाफ मुसलमान।

Monday, October 11, 2010

अमरनाथ से बालटाल

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अमरनाथ बाबा के दर्शन कर लिये। दर्शन करते-करते दस बज गये थे। अब वापस जाना था। हम पहलगाम के रास्ते यहां तक आये थे। दो दिन लगे थे। अब वापसी करेंगे बालटाल वाले रास्ते से। हमारी गाडी और ड्राइवर बालटाल में ही मिलेंगे।

अमरनाथ से लगभग तीन किलोमीटर दूर संगम है। संगम से एक रास्ता पहलगाम चला जाता है और एक बालटाल। यहां अमरनाथ से आने वाली अमरगंगा और पंचतरणी से आने वाली नदियां भी मिलती हैं। यहां नहाना शुभ माना जाता है। लेकिन अब एक और रास्ता बना दिया गया है जो संगम को बाइपास कर देता है। यह रास्ता बहुत संकरा और खतरनाक है। इस बाइपास वाले रास्ते पर खच्चर नहीं चल सकते। घोडे-खच्चर संगम से ही जाते हैं। इस नये रास्ते के बनने से यात्रियों को यह लाभ होता है कि अब उन्हें नीचे संगम तक उतरकर फिर ऊपर नहीं चढना पडता। सीधे ऊपर ही ऊपर निकल जाते है। इस बाइपास रास्ते की भयावहता और संकरेपन का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस पर कई जगह एक समय में केवल एक ही आदमी निकल सकता है। नतीजा यह होता है कि दोनों तरफ लम्बा जाम लग जाता है। इसी जाम में फंसने और निकलने की जल्दबाजी की जुगत में मैं इस खण्ड का एक भी फोटू नहीं खींच पाया।