Wednesday, May 19, 2010

यमुनोत्री में ट्रेकिंग

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अक्षय तृतीया जा चुकी है। उत्तराखण्ड में चार धाम यात्रा भी शुरू हो चुकी है। मुसाफिरों और श्रद्धालुओं को घूमने के लिये यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ जैसी जगहों के रास्ते खुल गये हैं। इन जगहों पर अब लोग-बाग आने-जाने शुरू हो गये हैं। जाहिर सी बात है कि सुविधायें भी मिलने लगी हैं।
पिछले महीने यानी चारधाम यात्रा शुरू होने से एक महीने पहले मैं अकेला यमुनोत्री के लिये चला था। सही-सलामत पहुंच भी गया। लेकिन वहां सब-कुछ सुनसान पडा था। ऐसा यमुनोत्री आपने कभी नहीं देखा होगा। वहां की काली कमली धर्मशाला प्रसिद्ध है। लेकिन वो भी बन्द थी, क्योंकि कोई नहीं जाता वहां कपाट बन्द रहने के दिनों में। उस रात मैं चौकीदार के यहां ठहरा था। वो सरकारी चौकीदार था, और बारहों मास यही रहता है। उसका परिवार नीचे बडकोट में रहता है। उन दिनों उसके साथ उसका लडका और एक नेपाली मजदूर रह रहे थे। मेरी इच्छा अगले दिन यमुना के उदगम स्थल सप्तऋषि कुण्ड तक जाने की थी। लेकिन बारिश ने सारे करे-कराये पर पानी फेर दिया। बारिश बन्द होने पर हम चारों मन बहलाने के लिये यमुना के साथ-साथ ऊपर की दिशा में चल दिये। उस यात्रा का विस्तृत विवरण आप पिछले भाग में पढ चुके हो।

एक झरने पर हम पहुंचे। यह यमुना का झरना था। वहां चारों ओर विशाल ग्लेशियर था। चौकीदार तो एक टूटे पेड का तना लेकर वापस चला आया था। मेरी इच्छा थी कि जितना भी आगे हम जा सकते थे, जायें। कोई लक्ष्य नहीं था हमारा। चौकीदार का लडका यशपाल और नेपाली भी मेरे इस इरादे से बडे खुश थे। वे कहने लगे कि यमुना के साथ साथ चलते हैं। और वे उस खतरनाक झरने के ऊपर चढने भी लगे थे, लेकिन मैं नहीं चढ पाया। लाख कोशिश कर ली, कभी पैर फिसल जाते, कभी सहारा लेने के लिये हाथ में पकडी घास उखड जाती। आखिरकार यह यमराज की बहन है, इसलिये यमुना के साथ जाना स्थगित कर दिया।
यहीं पर यमुना में एक और नदी आकर मिलती है। हम इसके साथ-साथ चल पडे। इस नदी के रास्ते में ग्लेशियर नहीं था, केवल बेतरतीब पत्थर थे। अब आगे की यात्रा का आनन्द लीजिये चित्रों के साथ:

दोनों तरफ सीधे खडे पहाड और बीच में बहती एक पतली सी जलधारा वाली तेज बहाव युक्त नदी

पत्थर ही पत्थर

सामने और पीछे यह दृश्य आम था।

पत्थरों के बीच से निकलती नदी। इन पत्थरों पर चढना भी कभी-कभी बेहद मुश्किल हो जाता है। पूरे रास्ते भर चढाई जारी रही।

नेपाली मजदूर की जैकेट पहने उस दिन यमुनोत्री का एकमात्र घुमक्कड

यह है वही नेपाली

नेपाली
एक झरना भी था रास्ते में, यमुनोत्री से कम से कम चार किलोमीटर ऊपर। यह यमुना नदी नहीं है, ये बात मैं पहले भी बता चुका हूं। खडे पहाडों के बीच से इस तरह के झरने इस इलाके में आम हैं।


प्यास लगती थी तो यही पानी पी लेते थे। जितनी ठण्डी हमारे यहां बरफ होती है, यह पानी उससे भी ठण्डा लगता है।


इसे कहते हैं जीवटता। ठीक नीचे नदी बेहद तेज वेग से बह रही है। यह वो जगह है जहां मुझे जिन्दगी में पहली बार चढने से डर लगा। चट्टान स्लेटी पत्थरों की बनी है। हाथ और पैर का दबाव पडते ही स्लेट बिखर जाती थी इसलिये सुरक्षित पकड नहीं बन पा रही थी। इसी जगह पर मेरे मन में आया था कि वापस चलो। लेकिन उन दोनों का जीवट देखकर और आगे तक गये। हम कोई प्रशिक्षित पर्वतारोही तो हैं नहीं, ना ही हमारे पास समुद्र तल से 4000 मीटर की ऊंचाई पर चलने के लिये उपकरण थे। जरा सी लापरवाही का मतलब था कि सब कुछ खतम। आगे जाने वाले को भी पता नहीं चलता कि पीछे वाला कहां गुम हो गया।


कम से कम दो-ढाई घण्टे चलने के बाद फिर ग्लेशियर आ गया। इरादा था कि जहां तक जा सकेंगे, जायेंगे। यहां तक हवा तेजी पकडने लगी थी। तेज हवा कानों को काटे जा रही थी। पछता रहा था कि कोई टोपा क्यों नहीं लाया। ये तो अच्छा हुआ कि जैकेट डाल ली थी, नहीं तो...


बरफ बढने लगी तो वापस चलना ही पडा। इस जगह को ध्यान से देखिये। यहां पहाडों में वो तीखापन नहीं है, जो थोडी देर पहले नीचे था। यानी हम चोटी के कहीं नजदीक हैं। हवा, तापमान, बरफ; और भी कई चीजों को देखते हुए वापस मुडना पडा।


चलो भाई, फोटो वोटो खींच लो। वापस चलते हैं।


जिस रास्ते से आये थे, उसी रास्ते से चल दिये। वेगवती नदी को कई बार पार भी करना पडा। काई ना होने की वजह से पानी में डूबे पत्थरों पर चिकनाहट नहीं है, इसलिये कभी-कभी तो पानी में डूबे पत्थरों पर भी पैर रखकर नदी पार करनी पडी। खतरा तो है ही लेकिन रोमांच भी कोई चीज होती है।


कुछ नीचे आकर वापस देखा तो पता चला कि हम वहां से वापस आये हैं, उस ग्लेशियर से। इस चित्र को अब भी देखता हूं तो शरीर में झुरझुरी सी होती है कि मैं वहां तक पहुंच गया था।


चौकीदार पुत्र यशपाल रावत
()

वादियां मेरा दामन


वापसी में यशपाल को एक खाल मिली। बोला कि यह कस्तूरी मृग की मृत देह है। महीनों पहले मरा होगा। अब तो इसमें से दुर्गन्ध भी नहीं आ रही थी। इस इलाके में कस्तूरी मृग की भरमार है। खाल को हमने यही छोड दिया था।


पुनः उसी यमुना वाले ग्लेशियर पर जो आपने पिछली पोस्ट में भी देखा था। दोनों ने एक एक तना उठाया और चल दिये।


एक बार फिर बरफ पर। नीचे यमुना बह रही है, बरफ के नीचे।


चल चला चल राही, चल चला चल राही


ये रहे तीनों। बायें चौकीदार का लडका यशपाल, बीच में नेपाली मजदूर, और दायें है चौकीदार। दोनों के नाम तो पूछे थे, लेकिन अब भूल गया हूं। इन्होने वादा किया है कि सितम्बर-अक्टूबर में आओ, तुम्हे सप्तऋषिकुण्ड घुमाकर लायेंगे। जाऊंगा जरूर।


यमुनोत्री के अन्तिम दर्शन।


धन्यवाद, आपके पुनः आगमन की प्रतीक्षा में। करते रहो भई प्रतीक्षा, आऊंगा जरूर।



(यह वीडियो 13 सेकण्ड की है। इसमें एक शानदार झरने को दिखाया गया है।)


यमुनोत्री यात्रा श्रंखला
1. यमुनोत्री यात्रा
2. देहरादून से हनुमानचट्टी
3. हनुमानचट्टी से जानकीचट्टी
4. जानकीचट्टी से यमुनोत्री
5. कभी ग्लेशियर देखा है? आज देखिये
6. यमुनोत्री में ट्रैकिंग
7. तैयार है यमुनोत्री आपके लिये
8. सहस्त्रधारा- द्रोणाचार्य की गुफा

28 comments:

  1. Bhai tera jawab nahin..ek lajawab zaanbaaz insaan hai re bhai..teri jai ho...aanand le liya zindagi ka tumne...waah,,,jiyo bhai ji jiyo...
    neeraj

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  2. आनन्द ही आ गया पढ़कर । जीवन का आनन्द भी यही है । लगे रहें ।

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  3. very adventurous ! I have also trekked on the same path along with Yamuna in September !
    For Saptarishi Kund only Sep./ Oct. is suitable .

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  4. सुंदर अभिव्यक्ति। घुमक्कड़ी जिन्दाबाद ....
    अपनी सक्रियता से हिंदी ब्लागिंग को आप और ऊंचाई तक पहुंचाएं यही कामना है।
    http://gharkibaaten.blogspot.com

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  5. नि:शब्द हूं आपकी मुसाफिरी और जीवटता देखकर
    सितम्बर-अक्तूबर में जाओगे तो मुझे जरूर बता देना
    आपके साथ जाने की इच्छा बलवती हो रही है

    प्रणाम

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  6. बड़ी इर्ष्या होती है बोस तुम्हारे से !

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  7. वाह क्या यात्रा करवाई आपने।
    आपकी हिम्मत की दाद देते है।
    सभी फोटो बहुत सुन्दर लगे।

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  8. यार बड़ा बेजोड़ यात्रा करी तुमने... टोपा तो आगे से हमेशा साथ राखियों... मैं भी सिक्किम के नाथुला इलाके में टोपी के बगैर गया था.

    यहाँ यमुनोत्री का व्यापक दर्शन हो गया.

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  9. नीरज भाई की जय हो , जमुनोत्री घुमाने के लिए धनयवाद
    अद्भुत यात्रा वृत्तांत था , हिन्दी में इससे अच्छा यमुनोत्री का वर्णन कही नहीं मिलेगा

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  10. नीरज जी मैं दुबारा आपके ब्लॉग पर ये कहने आया हूँ के यदि इश्वर ने मुझे आपकी घुमक्कड़ी का एक प्रतिशत जज़्बा भी दिया होता तो आज मैं माउन्ट एवरेष्ट पर बैठा मूंगफली खा रहा होता...लेकिन ये हो न सका...और मैं मन मसोस कर सिर्फ आपकी पोस्ट पर कमेन्ट ही कर प् रहा हूँ...:))
    आपकी घुमक्कड़ी जिंदाबाद...जिंदाबाद...जिंदाबाद...
    नीरज

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  11. एक बात तो बता दुं कि उस दिन हवा बिलकुल नही चल रही होगी, या फ़िर तुम मै सर्दी को सहने की बहुत ज्यादा ताकत होगी,आप की यात्रा सच मै साहस से भरपुर है, हम ने भी की है एक दोबार ऎसी यात्रा, ओर डर सच मै तभी लगता है जब विश्बास डग मगा जाये, सभी चित्र बहुत सुंदर लगे . धन्यवाद

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  12. मुबारक हो नीरज भाई, दोस्तों ये हैं हमारे देसी Bear Grylls...बोले तो Man v/s Wild का देसी वर्जन

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  13. गजब महाराज!! जरुर जाना..हमारे लिए तो तस्वीर देखकर खुश होना एक मात्र सहारा है. इतना चलना तो अगले जन्म के लिए स्थगित कर रखा है (कैंसिल नहीं) :)

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  14. अमां यार...आदमी हो क्या हो....
    इस बार कहीं जाओ...और अकेले से दो भले लगते हों तो साथ ले चलना....
    अद्भुत जीव हो...
    इतिहास में नाम लिखाने आए हो...लिखा जाएगा भी....

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  15. नीरज भाई की जय हो , जमुनोत्री घुमाने के लिए धनयवाद

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  16. DHANYAWAAD NEERAJ JI BLOG PAR ANE AUR AUR MERA HOSLA BADHANE KE LIYE
    UMEED HAI AGE BHI MERA HOSLA BADHAYEGE

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  17. यात्र संस्मरण और चित्र मनमोहक हैं!

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  18. नीरज, लाजवाब है भाई।
    लेकिन टोपी वगैरह साथ रखा करो यार, कोई शान नहीं कम हो जायेगी :))

    हम तो दिल्ली में जिस मटमैले नाले को देखते हैं, उसे ही यमुना समझते कहते थे, तुम्हारी यात्रा के वर्णन से सारे वहम धुल गए। यमुना तो वो थी, जहां नीरज घूम कर आया है।

    आभार।

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  19. जलजला आपको सलाम करता है।
    धूप में निकलो घटाओं में नहाकर देखो
    जिन्दगी क्या है किताबों को हटाकर देखो

    काश यह बात कुछ घटिया ब्लागर समझ पाते।

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  20. कमाल के घुमक्कड़ हो यार आप भी...बेमौसम ही यहाँ तक हो आये...बहुत खूब!!लगे रहो...

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  21. गर्मी में झरने /बर्फ ..हरियाली देख कर ही मन खुश हो गया...
    'आखिरकार यह यमराज की बहन है, इसलिये यमुना के साथ जाना स्थगित कर दिया'
    -पढकर बड़ी हंसी आई...:)

    बड़े खुशनसीब हैं आप जो इतनी सुन्दर जगहें घूमने को मिलता है...घुमक्कड़ कहें?
    बहुत अच्छी चित्रमय पोस्ट.

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  22. बहुत दिनों बाद आपके ब्लॉग पर आना हुआ है आपका लिंक खो गया था | धीमी गाती की वजह से सारे चित्र नहीं देख पाया जितने भी दिखे वो एक से बढ़ कर एक है |

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  23. बडे जिगर की बात है यहाँ तक पहुंचाना।
    आपको देख कर ही हम यह महसूस कर लेते हैं कि हम भी इन खूबसूरत नजारों का दीदार कर रहे हैं।
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    क्या हमें ब्लॉग संरक्षक की ज़रूरत है?
    नारीवाद के विरोध में खाप पंचायतों का वैज्ञानिक अस्त्र।

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  24. हम तो बस देख ही पा रहे हैं सोच रहे हैं कि अगर जाना हुआ तो अपना वजन कम से कम ४० प्रतिशत कम करना पड़ेगा, जब आप जैसे जवान को इतनी समस्याएँ पेश आयीं तो हमारा तो पता नहीं क्या होगा। :)

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  25. भाई मज़ा ही बाँध दिया

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  26. Bhai tumhari yatra sandar thi ager koi or Ana cahta ho to jarur aye hum yamunotri me apka wait krenge . Ager yamunotri me treeking krni ho to is no per contect kren . 9012415399. Sudheer Singh

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