Thursday, December 31, 2009

2009: मेरे अपने आंकड़े

पिछले साल इन दिनों में ही तय हो गया था कि मेरी बदली हरिद्वार से दिल्ली होने वाली है। इसलिए जनवरी का महीना काफी उथल-पुथल भरा रहा। जनवरी में ही इंटरव्यू और मेडिकल टेस्ट हुआ। फ़रवरी शुरू होते-होते सरकारी नौकरी भी लग गयी। नौकरी क्या लगी, बड़े बड़े पंख लग गए। मार्च में सेलरी मिली तो घूमने की बात भी सोची जाने लगी। कैमरा भी ले लिया।
अप्रैल की नौ तारीख को बैजनाथ के लिए निकल पड़ा। बैजनाथ हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में है। सफ़र में साथी था रामबाबू। बैजनाथ गए तो पैराग्लाइडिंग का स्वर्ग कहे जाने वाले बीड व बिलिंग भी हो आये। इसी यात्रा में चाय नगरी पालमपुरचामुंडा देवी के भी दर्शन किये।
इसके बाद मई का गर्म महीना आया। किसी और जगह को चुनता तो शायद कोई भी तैयार नहीं होता, लेकिन मित्र मण्डली को जब पता चला कि बन्दा शिमला जा रहा है तो तीन जने और भी चल पड़े। शिमला से वापस आया तो भीमताल चला गया। साथ ही रहस्यमयी नौकुचियातालनैनीताल का भी चक्कर लगा आया। इसके बाद कुछ दिन तक तो ठीक रहा, फिर जून आते आते खाज सी मारने लगी। तब चैन मिला गढ़वाल हिमालय की प्रसिद्द वादी व सैनिक छावनी लैंसडाउन पहुंचकर। इस बार के साथी रहे यह भी खूब रही वाले नरेश जी यानी प्रयास जी।
जुलाई का महीना यानी सावन का महीना। कांवडियों की बम बम। हम भी जा पहुंचे हरिद्वार कांवड़ लानेनीलकंठ गए और हरिद्वार से पुरा महादेव बागपत तक करीब 150 किलोमीटर की पैदल यात्रा की। इसी तरह अगस्त के बरसाती माहौल में जा पहुंचा मध्य प्रदेश। पहले तो भीमबैठका की गुफाएं देखीं, फिर महाकाल की नगरी उज्जैन होते हुए ताऊ के यहाँ इंदौर पहुँच गया। दूसरे ही दिन एक और ज्योतिर्लिंग ओम्कारेश्वर के दर्शन किये।
सितम्बर का महीना। बरसात ख़त्म होने के बाद और सर्दी शुरू होने से पहले का समय घुमक्कड़ों के लिए वरदान होता है। फिर भला मैं कैसे पीछे रहता? जा पहुंचा देवप्रयाग सचिन को साथ लेकर। लगे हाथों चन्द्रबदनी देवी के भी दर्शन कर लिए। जंगल में एक गुफा की खोज करते करते खुद ही भटक जाने में क्या आनंद आता है, वो आनंद लिया अक्टूबर में की गयी करोल यात्रा में। आजकल तो करोल के टिब्बे पर बरफ गिर गयी होगी। ना भी गिरी होगी तो देर-सबेर गिर ही जायेगी।
फिर आया नवम्बर। ठण्डा ठण्डा कूल कूल। ललित को साथ लिया और पहुँच गया धर्मशाला। कदम यहीं नहीं रुके बल्कि मैक्लोडगंज, दुर्गम त्रियुंड, कांगड़ा का किला, ज्वालामुखी और टेढ़ा मंदिर तक धावा बोला। साल का आखिरी महीना दिसम्बर। वैष्णों देवी के दर्शन करने जम्मू जाने की सूचना तो पहले ही प्रसारित कर दी थी। जब तक आप इसे पढोगे, तब तक शायद वापस भी ना आऊँ।
इतना होने के बाद रेलयात्रा का जिक्र ना हो, यह असंभव है। वर्ष 2009 में 90 बार रेल यात्रा की और 11935 किलोमीटर की दूरी तय की। पैसेंजर ट्रेनों से सर्वाधिक 58 बार में 4505 किलोमीटर, मेल/एक्सप्रेस में 22 यात्राओं में 3729 किलोमीटर और सुपरफास्ट में 10 यात्राओं में 3701 किलोमीटर की दूरी तय की। कुल मिलकर 31 दिसम्बर 2009 तक 300 रेलयात्राएँ हो जायेंगी व 36959 किलोमीटर की दूरी तय कर ली जायेगी। इनमे पैसेंजर से 159 बार में 12070 किलोमीटर, मेल/एक्सप्रेस में 99 बार में 14157 किलोमीटर और सुपरफास्ट में 30 बार में 10732 किलोमीटर की दूरी तय कर चुकूँगा।
अंत में नव वर्ष 2010 की सभी को शुभकामनाएं।

Thursday, December 10, 2009

टेढ़ा मन्दिर

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आज आपको टेढ़ा मंदिर के बारे में जानकारी देते हैं। यह मंदिर हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में ज्वालामुखी के पास स्थित है। ज्वालामुखी के ज्वाला देवी मंदिर की बगल से ही इसके लिए रास्ता जाता है। ज्वाला जी से इसकी दूरी करीब दो किलोमीटर है। पूरा रास्ता ऊबड़-खाबड़ पत्थरों से युक्त चढ़ाई भरा है। खतरनाक डरावने सुनसान जंगल से होकर यह रास्ता जाता है।
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यह मंदिर पिछले 104 सालों से टेढ़ा है। कहा जाता है कि वनवास काल के दौरान पांडवों ने इसका निर्माण कराया था। 1905 में कांगड़ा में एक भयानक भूकंप आया। इससे कांगड़ा का किला तो बिलकुल खंडहरों में तब्दील हो गया। भूकंप के ही प्रभाव से यह मंदिर भी एक तरफ को झुककर टेढ़ा हो गया। तभी से इसका नाम टेढ़ा मंदिर है। इसके अन्दर जाने पर डर लगता है कि कहीं यह गिर ना जाए।

Monday, December 7, 2009

ज्वालामुखी - एक चमत्कारी शक्तिपीठ

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ज्वालामुखी देवी हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में कांगड़ा से करीब दो घण्टे की दूरी पर है। दूरी मापने का मानक घण्टे इसलिए दे रहा हूँ कि यहाँ जाम ज़ूम नहीं लगता है और पहाड़ी रास्ता है, मतलब गाड़ियां ना तो रूकती हैं और ना ही तेज चाल से दौड़ पाती हैं। ज्वालामुखी एक शक्तिपीठ है जहाँ देवी सती की जीभ गिरी थी। सभी शक्तिपीठों में यह शक्तिपीठ अनोखा इसलिए माना जाता है कि यहाँ ना तो किसी मूर्ति की पूजा होती है ना ही किसी पिंडी की, बल्कि यहाँ पूजा होती है धरती के अन्दर से निकलती ज्वाला की।
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धरती के गर्भ से यहाँ नौ स्थानों पर आग की ज्वाला निकलती रहती है। इन्ही पर मंदिर बना दिया गया है और इन्ही पर प्रसाद चढ़ता है। आज के आधुनिक युग में रहने वाले हम लोगों के लिए ऐसी ज्वालायें कोई आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि पृथ्वी की अंदरूनी हलचल के कारण पूरी दुनिया में कहीं ज्वाला कहीं गरम पानी निकलता रहता है। कहीं-कहीं तो बाकायदा पावर हाऊस भी बनाए गए हैं, जिनसे बिजली उत्पादित की जाती है। लेकिन यहाँ पर यही तो चमत्कार है।

Thursday, December 3, 2009

कांगड़ा का किला

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किला - जहाँ कभी एक सभ्यता बसती थी। आज वीरान पड़ा हुआ है। भारत में ऐसे गिने-चुने किले ही हैं, जहाँ आज भी जीवन बसा हुआ है, नहीं तो समय बदलने पर वैभव के प्रतीक ज्यादातर किले खंडहर हो चुके हैं। लेकिन ये खंडहर भी कम नहीं हैं - इनमे इतिहास सोया है, वीरानी और सन्नाटा भी सब-कुछ बयां कर देता है।
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भारत में किलों पर राजस्थान का राज है। महाराष्ट्र और दक्षिण में भी कई प्रसिद्द किले हैं। मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में भी किले हैं। दिल्ली में लाल किला और पुराना किला है। लेकिन हिमालय क्षेत्र में बहुत कम किले हैं। क्योंकि हिमालय खुद एक प्राकृतिक किला है। इसमें शिवालिक जैसी मजबूत बाहरी दीवार है। पहाड़ इतने दुर्गम हैं कि किसी आक्रमणकारी की कभी हिम्मत नहीं हुई। फिर भी हिमालय क्षेत्र में कई किले हैं। इनमे से एक है - कोट कांगड़ा यानी कांगड़ा का किला।