Thursday, July 30, 2009

कांवड़ यात्रा - भाग दो

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बरला इंटर कॉलेज खेतों के बीच लम्बा चौडा बना हुआ कॉलेज है। इसलिए एक तो ठंडी हवा चल रही थी, दूसरे पंखे भी चल रहे थे। नीचे दरी बिछी हुई थी। एक थके हुए भोले को रात को सोने के लिए इससे बेहतर और क्या चाहिए? इतनी धाकड़ नींद आई कि कब सुबह के सात बज गए पता ही नहीं चला। उठे तो देखा कि बरामदा अब बिलकुल खाली है, सभी भोले जा चुके हैं।
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हालाँकि कॉलेज में चहल-पहल थी। सुबह का नाश्ता चल रहा था। हमने नहा-नूह कर चाय पी। हम चूंकि काफी देर से उठे थे तो अब जल्दी से जल्दी निकल लेने में ही भलाई थी। लेकिन मेरे लिए अब चलना भी मुश्किल हो रहा था। कल जो हम अपनी औकात से ज्यादा तेज चले थे तो इसका नुकसान अब होना था। अब तो नोर्मल स्पीड भी नहीं बन पा रही थी। इंजन, पिस्टन सब ढीले पड़े थे। पहियों में पंचर हो चुका था। ऑयल टैंक भी खाली हो गया था। अब तो बस चम्मक-चम्मक ही चल रहे थे।

Monday, July 27, 2009

कांवड़ यात्रा - भाग एक

जैसे-जैसे सावन में शिवरात्रि आती है, वैसे-वैसे मन में कांवड़ लाने की हिलोर सी उठने लगती है। मैं पूरे साल कभी भी भगवान् का नाम नहीं लेता हूँ, ना ही कभी धूपबत्ती-अगरबत्ती जलाता हूँ, ना किसी मंदिर में जाकर मत्था टेकता हूँ, ना प्रसाद चढाता हूँ, ना दान करता हूँ। लेकिन सावन आते ही - चलो चलो हरिद्वार।
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मोहल्ले के जितने भी हमउम्र और कमउम्र लडकें हैं, सभी ने तय किया कि 14 जुलाई को हरिद्वार के लिए रवाना होंगे, 15 को वहीं पर रहेंगे और 16 को कांवड़ उठा लेंगे। 19 तारीख तक पुरा महादेव बागपत पहुंचकर जल चढा देंगे। अपनी 15-16 लड़कों की टोली 14 जुलाई को सुबह दस बजे तक मोहल्ले के मंदिर प्रांगण में इकठ्ठा हो गयी। मेरे साथ छोटा भाई आशु भी था। टोली क्या पूरा मोहल्ला ही साथ था। शिवजी से कुशल यात्रा की विनती करके, बड़ों के आशीर्वाद लेकर, बम-बम के जयकारे लगते हुए यह टोली बस स्टैंड की तरफ बढ़ चली।

Monday, July 13, 2009

कांवडिये कृपया ध्यान दें!

सावन आ गया है। कांवड़ यात्रा शुरू हो चुकी है। राजस्थानी कांवडिये तो हरिद्वार से जल लेकर मेरठ पार करके दिल्ली को भी पार कर रहे हैं। दिल्ली वाले कांवडिये हरिद्वार पहुँच चुके हैं या पहुँचने ही वाले हैं। गाजियाबाद व मेरठ व आस पास वाले भी एक दो दिन में पहुँच रहे हैं। कांवडियों की बढती तादाद के मद्देनजर प्रशासन भी चौकस है। हरिद्वार से मेरठ तक तो नेशनल हाईवे बंद हो गया है। दो दिन बाद मेरठ-दिल्ली रोड भी बंद हो जायेगी।
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ऐसी परिस्थिति में व्यवस्था बनाये रखने की सारी जिम्मेदारी कांवडियों की ही हो जाती है। तो मैं यहाँ पर कुछ बातें लिख रहा हूँ, अगर किसी कांवडिये ने पढ़ ली और इन पर अमल करने की कसम खा ली तो उसे कांवड़ लाने के बराबर ही पुण्य मिलेगा।

Thursday, July 2, 2009

लैंसडाउन यात्रा

पहले परिचय- लैंसडाउन उत्तराखंड के पौडी गढ़वाल जिले में है। इसकी समुद्र तल से ऊँचाई लगभग 1500 मीटर है। यहाँ गढ़वाल रेजिमेंट का मुख्यालय भी है। सारा प्रशासन मिलिट्री के ही हाथों में है।
क्या देखें- लैंसडाउन में कुछ भी देखने के लिए पहले यहाँ जाना पड़ता है।
कैसे जाएँ- यहाँ जाने के लिए पौडी जाने की जरुरत नहीं है। कोटद्वार से ही काम चल जाता है। कोटद्वार से दूरी 42 किलोमीटर है। कोटद्वार से 20 किलोमीटर आगे दुगड्डा है।