Thursday, May 28, 2009

शिमला के फोटो

2 मई 2009, शनिवार। बीस दिन से भी ज्यादा हो गए थे, तो एक बार फिर से शरीर में खुजली सी लगने लगी घूमने की। प्लान बनाया शिमला जाने का। लेकिन किसे साथ लूं? पिछली बार कांगडा यात्रा से सीख लेते हुए रामबाबू को साथ नहीं लिया। कौन झेले उसके नखरों को? ट्रेन से नहीं जाना, केवल बस से ही जाना, पैदल नहीं चलना, पहाड़ पर नहीं चढ़ना वगैरा-वगैरा। तो गाँव से छोटे भाई आशु को बुला लिया। आखिरी टाइम में दो दोस्त भी तैयार हो गए- पीपी यानि प्रभाकर प्रभात और आनंद।
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तय हुआ कि अम्बाला तक तो ट्रेन से जायेंगे। फिर आगे कालका तक बस से, और कालका से शिमला टॉय ट्रेन से। वैसे तो नई दिल्ली से रात को नौ बजे हावडा-कालका मेल भी चलती है। यह ट्रेन पांच बजे तक कालका पहुंचा देती है। हमें कालका से सुबह साढे छः वाली ट्रेन पकड़नी थी। लेकिन हावडा-कालका मेल का मुझे भरोसा नहीं था कि यह सही टाइम पर पहुंचा देगी।

Saturday, May 16, 2009

पालमपुर यात्रा और चामुण्डा देवी

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दिनांक 12 अप्रैल 2009, रविवार। सुबह को सोकर उठे तो बुरी तरह अकड़े हुए थे। हम पैर रख कहीं रहे थे, पड़ कहीं रहे थे। ये सब कल की बिलिंग की चढाई की करामात थी। तभी रामबाबू भागा-भागा आया। बोला कि ओये, यहाँ पर भूलकर भी मत नहाना। पानी बहुत ही ठंडा है। मुझे तो ना नहाने का बहाना चाहिए ही था। हालाँकि मुहं धो लिया था। वाकई घणा ठंडा पानी था।
नाश्ता किया। हमें आज योजनानुसार पहले तो न्युगल खड जाना था।

(न्युगल खड)

Saturday, May 9, 2009

हिमाचल के गद्दी

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हिमाचल के घुमंतू चरवाहों को गद्दी कहते हैं। इनके पास घर तो होता है, पर ठिकाना नहीं होता। अपने घरों में इनका मन नहीं लगता। साल भर में चले जाते हैं एकाध बार। बाकी पूरे साल पहाडों पर जंगलों में ही रहते हैं। काम क्या करते हैं? भेड़-बकरियां पालते हैं और बेच देते हैं। भेडें ही इनकी संपत्ति होती हैं। इनके पास सैकडों की संख्या में भेडें होती हैं।


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Friday, May 1, 2009

बिलिंग यात्रा

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दिनांक 11 अप्रैल, 2009, शनिवार। बीड तो पहुँच गए। बीड बैजनाथ से 13 किलोमीटर दूर है। बैजनाथ व पालमपुर से काफी बसें मिल जाती हैं। बीड से 14 किलोमीटर 'ऊपर' बिलिंग है। बिलिंग जाने के दो तरीके हैं- टैक्सी व पैदल।
हमने दूसरा तरीका चुना। ऊपर सामने एक समतल सी पेड़ रहित चोटी है। वहीं बिलिंग है। कुछ दूर तो हम सड़क के साथ ही चले। जब हमें पहाड़ पर जाती एक पगडण्डी दिखी, तो हम रुक गए। सोचा कि किसी से पूछ लें कि क्या यही पगडण्डी बिलिंग जाती है? लेकिन कोई नहीं दिखा। फिर भी हमने चढ़ना शुरू कर दिया। सड़क को छोड़ दिया। पगडण्डी अच्छी तरह से हमारा साथ दे ही रही थी।