Monday, December 29, 2008

मसूरी भ्रमण-2

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मैं सोचने लगा कि चलो देहरादून पहुंचकर कहीं आगे की गाड़ी पकड़ते हैं। हमारे पास पहला विकल्प था मसूरी जाने का लेकिन दोनों की जेबें खाली। फ़िर सोचा कि वहां चलेंगे, भला कहाँ? अरे यार वहां, क्या नाम है.....सहस्त्रधारा। या फ़िर चलेंगे डाकपत्थर। मसूरी तो जाने का सवाल ही नहीं था। तभी विभूति ने पूछा कि अब कौन सा स्टेशन आएगा? मैंने कहा- डोईवाला। तभी अचानक दिमाग में विस्फोट सा हुआ। "अरे हाँ, लच्छीवाला भी तो यहीं पर है। अब देहरादून नहीं चलते। लच्छीवाला चलते हैं।" विभूति महोदय कभी इधर आए तो थे नहीं, मैं जिधर का भी नाम ले दूँ, मेरी हाँ में हाँ।
खैर, तय हो गया कि लच्छीवाला ही चलते हैं। वैसे गाड़ी का स्टोपेज तो था नहीं, फ़िर भी हमने उतरने का पूरा मूड बना लिया। हमें यकीन था कि यहाँ पर गाड़ी की स्पीड थोडी कम तो होगी ही। बस उतर जायेंगे। लेकिन स्टेशन आते आते स्पीड और बढ़ गई। बेचारे दोनों मन मसोसकर रह गए। आगे लच्छीवाला पुल पर भी नहीं उतर सके।

Friday, December 26, 2008

मसूरी भ्रमण-1

21 सितम्बर 2008, दिन था रविवार। छुट्टी भी थी। सुबह आठ बजे तक मैं और सचिन दोनों सोने का कम्पटीशन कर रहे थे। अखबार वाला अखबार डाल के कभी का जा चुका था। जैसा कि हर बार होता है, सोने का कम्पटीशन मैं ही जीता। देखा कि सचिन अख़बार पढ़ रहा है। मैंने माँगा तो मना कर दिया। मुझ बेचारे की तो आदत भी ऐसी बिगड़ गई है कि बिना अख़बार पढ़े टट्टी-पेशाब नीचे नहीं उतरता।
क्या करुँ? और कोई दिन होता तो सचिन दो मिनट में ही सारा का सारा अख़बार चाट देता है। कभी कभी तो चाटता भी नहीं। और आज? मुझे देख देख कर तरसा तरसा कर पढ़ रहा था। इस समय मेरे धैर्य की इंटर की फिजिक्स की परीक्षा चल रही थी।

Thursday, December 25, 2008

रुड़की में चली थी भारत की पहली रेल

अगर आपसे पूछा जाए कि भारत में पहली बार रेल कहाँ चली थी, तो निःसंदेह आपका जवाब ग़लत होगा। शायद आप कहें "मुंबई से ठाणे" और फ़िर इतिहास भी बताने लगें कि सोलह अप्रैल 1853 को 34 किलोमीटर की दूरी तय की थी। लेकिन ये जवाब तो सरासर ग़लत है। सही जवाब है कि भारत की पहली रेल रुड़की में चली थी।
यह रेल मालगाडी थी। शुरू में तो यह मानव शक्ति से खींची जाती थी, लेकिन बाद में भाप का इस्तेमाल होने लगा था। इसके विपरीत मुंबई-ठाणे वाली रेल सवारी गाड़ी थी।
1850 में अंग्रेजों ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अकाल और सूखे से बचाने के लिए एक नहर परियोजना की शुरूआत की। इसे आजकल गंगनहर के नाम से जाना जाता है। यह नहर हरिद्वार से निकलकर रुड़की, मुज़फ्फ़रनगर, मेरठ, गाजियाबाद, बुलंदशहर होते हुए कानपुर तक चली जाती है।

Tuesday, December 23, 2008

चीला के जंगलों में


इस इतवार को हमने मूड बनाया चीला में घूमने का। राजाजी राष्ट्रीय पार्क में तीन मुख्य रेंज हैं-चीला, मोतीचूर और एक का नाम याद नहीं। सुबह ही हल्का नाश्ता करके मैं, डोनू और सचिन तीनों चल पड़े। हरिद्वार बस स्टैंड से पैदल हर की पैडी पहुंचे।

Tuesday, December 16, 2008

मेरठ - हस्तिनापुर से 1857 तक

मेरठ की स्थापना किसने की, कब की? काफी दिनों से ज्ञात करने की कोशिश में था। लेकिन एक बात तो तय है कि मेरठ रावण की ससुराल रहा है। रावण के ससुर का नाम था- मयराष्ट्र। यही नाम बाद में बिगड़ कर मेरठ हो गया।
रावण भी मेरठ से लगभग सत्तर किलोमीटर दूर बिसरख गाँव का रहने वाला था। यह आजकल नोयडा के पास है। गाजियाबाद के पुराने बस अड्डे से नियमित बस सर्विस है। इस गाँव में आज भी दशहरा नहीं मनाया जाता। यह एक नीचे से टीले पर बसा हुआ है। अगर उस टीले की खुदाई करते हैं तो रामायण कालीन शस्त्र निकलते हैं।
अब आते हैं असली बात पर यानी हस्तिनापुर। मैंने कईयों से यह सुना है कि हस्तिनापुर गंगा यमुना के बीच के दोआब को कहते हैं। लेकिन बहुत कम लोगों को यह मालूम है कि हस्तिनापुर मेरठ जिले में है। यह मवाना तहसील के अंतर्गत आता है।

Saturday, December 13, 2008

राजाजी राष्ट्रीय पार्क में मोर्निंग वाक

बात करीब दो साल पुरानी है। उस समय मैं कॉलेज में पढता था। फाइनल इयर की परीक्षाएं होने को थी। इन परीक्षाओं के बाद मेरा मन आगे पढने का नहीं था, बल्कि नौकरी करने का था। मैंने सोचा कि परीक्षा ख़त्म होने के बाद BHEL हरिद्वार में एक साल की ट्रेनिंग करूंगा। इसके लिए पहले ही आवेदन करना जरूरी था। इसलिए एक दिन समय निकालकर मैं और कमल हरिद्वार पहुँच गए।
अप्रैल का महीना था। सुबह सुबह चार बजे हम दोनों हरिद्वार रेलवे स्टेशन पर थे। हमें BHEL ग्यारह बजे के बाद जाना था। सात घंटे अभी भी बाकी थे। इतना टाइम कैसे गुजारें। तय हुआ कि चंडी देवी मन्दिर तक घूम कर आते हैं। यह हरिद्वार से छः किलोमीटर दूर पहाडी पर स्थित है। रास्ता भी पैदल का ही है। चल पड़े दोनों।
गंगा का पुल पार करके हम बाइपास रोड पर पहुंचे। यह रोड आगे ऋषिकेश चली जाती है। इसी में से एक रास्ता दाहिने से कटकर ऊपर चंडी देवी मन्दिर तक जाता है। मैंने सोचा कि मन्दिर जायेंगे, वहां पर कम से कम ग्यारह ग्यारह रूपये का प्रसाद भी चढाना पड़ेगा। चलो आज इस रोड पर सीधे चलते है। कमल कहने लगा कि पता नहीं यह रोड कहाँ जाती है। आगे पूरा इलाका राजाजी राष्ट्रीय पार्क का है। इतनी सुबह को कोई वाहन भी नहीं दिख रहा है। रहने दे।