Saturday, November 29, 2008

मुसाफिर जा पहुँचा कुमाऊँ में (भाग-2)

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पहाड़ पर गांवों में घर दूर दूर होते हैं। बीच में खेत होते है। अब रमेश मुझे गाँव के मन्दिर में ले गया। मन्दिर क्या एक पीपल के पेड़ के नीचे पूजा घर की तरह था। इस मन्दिर के पुजारी रमेश के पिताजी ही थे। मान्यता है कि हर रोज ताजे निकले दूध में से थोड़ा थोड़ा यहाँ पर चढाया जाता है। नहीं तो अगले दिन से पशु के थन से दूध की जगह खून निकलता है।
अब रमेश कहने लगा कि चल तुझे एक गुफा दिखता हूँ। पूरा गाँव पार करके इस पहाडी की चोटी से ज़रा सा नीचे एक छोटी सी गुफा थी। हम उसे बाहर से ही देखने लगे। तभी अचानक मैं चौंक पड़ा। इसकी दीवारों पर सांप जैसी आकृतियाँ बनी हुई थी। पहली बार में तो मैं भी सोच बैठा था कि इसमे तो सांप हैं। लेकिन वो बिल्कुल प्राकृतिक थी।

Thursday, November 27, 2008

मुसाफिर जा पहुँचा कुमाऊँ में (भाग-1)

दिनांक- दीवाली के बाद, 2007। मैं जैसे ही कंपनी में पहुँचा, पता चला कि आज रमेश नहीं आया था। उन दिनों मैं नोएडा में था। रमेश का भाई कैलाश भी इसी कंपनी में था। दीवाली के एक दिन बाद कैलाश तो आ गया था, लेकिन रमेश अभी तक नहीं आया था। दीवाली की छुट्टियों में गाँव गया हुआ था। मुझे पता था कि उनका गाँव नैनीताल के पास कहीं है। पक्का नहीं पता था कि कहाँ है, न ही गाँव का नाम मालूम था।
जब कैलाश आ गया तो मैंने उससे रमेश के बारे में पूछा। उसने बताया कि वो अभी गाँव में ही है। दो तीन दिन में आ जाएगा। तभी मेरे दिमाग में आया कि उसके गाँव जाया जाए। दो तीन दिन बाद मैं और रमेश दोनों इकट्ठे वापस आ जायेंगे।

Tuesday, November 25, 2008

और पहुँच गए नैनीताल

चलो अब शुरू करते हैं मुसाफिरगिरी। घूमने का शौक तो बहुत है, लेकिन घर वाले कहीं नहीं जाने देते। जहाँ भी जाता हूँ, चोरी से जाता हूँ, अकेला जाता हूँ। वो एक गाना है ना- चल अकेला चल अकेला, तेरा मेला पीछे छूटा राही चल अकेला। कभी कभी दिमाग में आता है कि अगर कभी कोई मुसीबत आ गई तो। बन्दे के पास इसका भी जवाब है- जिंदगी एक सफर है सुहाना, यहाँ कल क्या हो किसने जाना।
पिछले साल इन्ही दिनों मैं नोएडा की एक कंपनी में कार्यरत था। शिफ्टों की ड्यूटी, कभी सुबह पाँच बजे ही निकलना, कभी देर रात बारह एक बजे तक आना, कभी पूरी पूरी रात जागना। अपनी तो यही जिंदगी थी। इतवार को सुकून मिलता था। उसमे मैं पता नहीं कहाँ कहाँ निकल पड़ता था।

Friday, November 14, 2008

नीलकंठ महादेव और झिलमिल गुफा, ऋषिकेश

अभी कुछ ही दिन पहले धुन सवार हुई कि नीलकंठ चलें। मैंने ख़ुद ही दिन भी तय कर लिया कि इस इतवार को जाऊँगा। अपना तो एक ही ध्येय वाक्य है- चल अकेला चल अकेला। फिर भी टोकने वाले अंदाज में सभी दोस्तों को टोक डाला। कोई भी साथ चलने को तैयार नहीं हुआ। कोई बात नहीं, यह मुसाफिर जाट किसी की मर्जी का मोहताज नहीं है। नीलकंठ जाना थोड़ा दुर्गम भी है और सुगम भी। पैदल जायें तो दुर्गम और बेहद थकाऊ व खतरनाक। ऋषिकेश से चौदह किलोमीटर की अनवरत खड़ी चढाई। कोई अपने को कितना भी तीसमार खां समझता हो, पैदल जाने में तो फूँक निकल जाती है। दूसरा रास्ता जीप वाला है, जो करीब तीस किलोमीटर पड़ता है।

Monday, November 10, 2008

हरिद्वार में गंगा आरती

इस शनिवार को हमने पहले ही योजना बना ली थी कि कल हरिद्वार चलेंगे। वैसे तो मैं हरिद्वार में ही नौकरी करता हूँ। हरिद्वार से बारह किलोमीटर दूर बहादराबाद गाँव में रहता हूँ। कभी कभी सप्ताहांत में ही कहीं घूमने का मौका मिल पाता है। कमरे पर मैं और डोनू ही थे। इतवार को आठ बजे सोकर उठे। बड़े जोर की भूख भी लग रही थी। सोचा कि चलो परांठे बनाते हैं, आलू के। मैंने आलू उबलने रख दिए। डोनू पड़ोसी के यहाँ से कद्दूकस ले आया। बड़ी ही मुश्किल से परांठे बनाये। कोई ऑस्ट्रेलिया का नक्शा बना, कोई अमेरिका का। एक तो बिल्कुल इटली का नक्शा बना। दस बजे तक हम कई देशों को खा चुके थे। इतवार को सबसे बड़ी दिक्कत होती है-कपड़े धोने की। पूरे सप्ताह के गंदे कपड़े इतवार की बाट देखते रहते हैं। मेरे तीन जोड़ी थे, जबकि डोनू के भी करीब इतने ही थे। जितने चुस्त हम खाने में हैं, उतने ही सुस्त काम करने में। सुबह को आठ बजे तक पानी आता है, फिर दोपहर को आता है, भर लिया तो ठीक, वरना नल से खींचना पड़ता है। आठ बजे तो हम सोकर ही उठे थे। फिर भी हमने तीनों बाल्टी, सारे बड़े बर्तन जैसे कि कुकर, भगोना, पतीली वगैरा सब भरकर रख लिए। कौन खींचे नल से?